ज्ञान की किताब का कोई अंतिम पृष्ठ नहीं होता : मुनि श्री समता सागर जी महाराज

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अहिंसा क्रांति /ब्यूरो चीफ देवांश जैन

विदिशा(भद्दलपुर) – उत्साह कभी वूड़ा नहीं होता, और ज्ञान अर्जन करने की कोई उम्र नहीं होती, ज्ञान की किताब का कोई अंतिम पृष्ठ नहीं होता इसलिये ज्ञान को अनंत कहा गया है, “जिन खोजा तिन पाईयां” जो वावले लोग तैरने से डरते है, वह कभी तैरने का आनंद नहीं ले पाते, और जो ज्ञान की प्राप्त करने में उम्र का वंधन महसूस करते है, वह कभी ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकते, तैरने का आनंद तो वही ले सकता है, जो गहराई में जाता है, वह ही उन मोतीओं को पा सकता है, जो ज्ञान की गहराई में उतरता है। उपरोक्त उदगार मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने १६ दिवसीय श्री भक्तामर महिमा शिविर के दौरान शीतलधाम में प्रातःकालीन धर्म सभा में व्यक्त किये मुनि श्री ने भक्तामर स्त्रोत्र के चार पांच और छंटवे काव्य की व्याख्या करते हुये कहा कि “मनुष्य के अंदर वुद्धि का होंना आवश्यक है, लेकिन वुद्धि कंहा से आऐ? वुद्धि किसी वाजार में या किसी चौराहे पर तो मिलती नहीं, धन देकर आप सामान तो खरीद सकते है, लेकिन वुद्धि को नहीं खरीद सकते, वुद्धि तो आपके ज्ञान के क्षयोपशम से ही आऐगी!

आचार्यश्री मानतुंगाचार्य जी जेल में वंद है, लेकिन प्रभु की भक्ती में रमे हुये है,अपने हृदय में प्रभु को धारण करते हुये अंतरंग गहराई में उतर कर कह रहे है, कि हे प्रभु मेरे में इतनी सामर्थ कंहा है, कि में आपकी भक्ती कर सकूं?मेरी भक्ती तो उस हिरनी के समान है, जिसके अंदर कोई सामर्थ नहीं है, फिर भी वह “मां” अपने वच्चे को वचाने के लिये वलशाली सिंह के सामने अपना सामर्थ दिखा देती है, है भगवन् आपके विशाल गुणों के सामने मेरा स्तवन करना तो ऐसा लग रहा है, कि सामने समुद्र है, जिसमें वड़े वड़े मगर मच्छ और घड़ियाल है और उस उस समुद्र को मेरे जैसा साधारण मनुष्य पार करने का दुस्साहस कर रहा है! अपनी लघुता को प्रगट करते हुये कहते है कि है भगवन् में आपकी भक्ती कर सकूं मेरे पास तो इतनी वुद्धि भी नहीं है, और में जानता हूं कि वुद्धि के विना कोई काम नहीं होता, लेकिन फिर भी में अल्प वुद्धि के डर से आपकी भक्ती को छोड़ने वाला भी नहीं हूं।

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मुनि श्री ने कहा कि इस काव्य के माध्यम से आचार्य मानतुंगाचार्य ने हिरणी का उदाहरण सिंह के सामने देकर उस मातृत्व भाव को दर्शाया है, जिसमें एक मां अपने वच्चे के प्राण वचाने के लिये कुछ भी करने को तैयार हो जाती है, वंही  दूसरी और अपने दाइत्व वोध समझते हुये कहते है, कि में फैल हो जाऊंगा इस डर से आपकी भक्ती को छोड़ने वाला नहीं हूं। मुनि श्री ने कहा कि  “फैल हो जाना कोई वड़ी वात नहीं, लेकिन फैल हो जाने के डर से यदि पड़ना ही छोड़ दिया तो वह व्यक्ति कभी कामयाब नही हो सकता। उन्होंने कहा कि मिट्टी को जितना अधिक खोदा जाऐगा तो पानी मिल जाता है, उसी प्रकार जिनवाणी को जितना खोजोगे उतना ज्ञान पाते चले जाओगे। “जिन खोजा तिन पाइंया, गहरे पानी पेंठ” जितनी गहराई में आप उतरते चले जाओगे, तभी आप मोती को पा सकते हो। धर्म की वातें की धर्म का ज्ञान, धर्म के सूत्रों के लिये तो 24 घंटे भी कम जिसे लगते है, वह ही जिन सूत्रों को जिनधर्म को,और जिनवाणी को पा सकता हे।

आचार्य मानतुंगाचार्य जी जेल में भले ही वंद थे, लेकिन उस आत्म साधक ने अपने चैतन्य परिणामों को जाग्रत करके रखा था। यह घटना से हम सभी को यह सवक मिलता है, कि कितनी भी वड़ी मुसीबत आ जाऐ लेकिन उन संकटों से उन उपसर्गों में भी अपने परिणाम को सम्हाल कर रखना चाहिये। मुनि श्री ने कहा कि यह घटना कोई वहुत पुरानी घटना नहीं है सांतवी शताव्दी की यह घटना है, जव राजा हर्षवर्धन के काल में आचार्य मानतुंगाचार्य को किसी घटना में कारागार में डाल दिया गया था तो उन्होंने किसी और को दोष नहीं दिया वल्कि अपने कर्म को ही जिम्मेदार मान वह उस कारागार में भी उस कवि हृदय ने साधना के तप से तपे तपाए शव्दों से इस महान भक्तामर ग्रन्थ की ही रचना कर दी फिर भी अपने आपको अल्पवुद्धी वाला ही कहते रहे,

अपने आपको अल्पज्ञानी वताते हुये कहते है कि में आपकी भक्ती करने के योग्य ही नहीं हूं और आपकी भक्ती करने का दुस्साहस कर रहा हुं! मुनि श्री ने कहा कि साहित्य सृजन करना इतना सहज नहीं है, जव कोई कवि या कोई साहित्यकार लेखन में डूव जाताहै, तो फिर उसे उसके आसपास की भी कोई क्रिया नजर नहीं आती वह अपने साहित्य में इतना रम जाता है,कि उसे कुछ नजर नहीं आता। आचार्य मानतुंगाचार्य कहते है, कि जैसे आम्र के फल आने का समय हो और आम्र की मंजरियों को देख कोयल चुप नही रह सकती? उसी प्रकार हे भगवन् आपको देखकर ही ये भक्ती के स्वर है, जो स्वतः अपने आप ही निकल रहे है। जैसे सांयकाल होता है और भगवान की भक्ती में तो जिनके घुटने भी दर्द करते है, उनके घुटने भी ठीक हो जाया करते है। सांयकाल आकर देखो भक्ती को?

उन्होंने गुरू भक्ती का उदाहरण देते हुये कहा कि दिसम्वर का माह कड़कड़ाती ठंड और घाटोल राजस्थान से लगभग 400 कि. मी का विहार नेमावर की और हुआ पता ही नहीं चला और यह दूरी १५ दिन में पूरी कर ली  वर्षों वाद गुरु को देखा था और गुरु चरणों में आया तो सोचा था कि गुरु चरणों में पहुंच कर मौन रहूंगा लेकिन जैसे ही गुरु चरणों में पहुंचा और में मौन रह जाऊं सम्भव नहीं था, उन्होंने कहा कि भगवान के चरणों में आकर में भले ही में अज्ञानी था लेकिन जो स्वर निकले वह गुरु भक्ती में निकलते चले गये। उन्होंने इन तीन काव्य के माध्यम से सभी को रिद्धि सिद्धी और वुद्धी मंगल आशीर्वाद दिया। उपरोक्त जानकारी प्रवक्ता अविनाश जैन ने देते हुये वताया प्रतिदिन तीन तीन काव्य का पाठ प्रातःकालीन वेला में ८ से नौ वजे तक चल रहा है।

~ब्यूरो चीफ देवांश जैन विदिशा, मध्यप्रदेश
सम्पर्क – 7828782835 / 8989696947

श्री १००८ शीतलनाथ भगवान के गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान कल्याणको से सुशोभित भूमि भद्दलपुर, विदिशा (म.प्र.) स्थित निर्माणाधीन समोशरण मंदिर

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