जो प्रतिमाएं जितनी अधिक प्राचीन होती है, उनकी पूजा और भक्ती का विशेष प्रभाव पड़ता है : मुनि श्री

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विदिशा(भद्दलपुर) – जव कभी भी कोई भव्य आत्मा चेतना की गहराई में उतर कर अपनी आत्मा के स्वरों के साथ नाद करती है, तो उसकी गूंज तीनों लोक में गुंजायमान हो जाया करती है, और उन संकटों से उन उपसर्गों से स्वं की तो रक्षा करते ही है, साथ ही धर्म की रक्षा करते हुये अपने कर्म वंधनों से भी मुक्त हो जाया करते है। उपरोक्त उदगार मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने शीतलधाम विदिशा में आयोजित १६ दिवसीय श्री भक्तामर स्त्रोत महिमा शिविर के प्रथम दिवस प्रारंभ के तीन स्लोकों की व्याख्या करते हुऐ कही। उन्होंने कहा कि जो प्रतिमाएं जितनी अधिक प्राचीन होती है, उनकी पूजा और भक्ती का विशेष प्रभाव पड़ता है।

शीतलधाम पर भगवान श्री आदिनाथ स्वामी की हजारों वर्षों प्राचीन प्रतिमा विराजमान है, उस प्रतिमा का तो अपने आप में एक अतिशय है ही, और अतिशय को अतिशयोक्ती प्रदान की है, इस युग के साक्षात भगवन् संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने आप और  हम सभी ने देखा है। भगवान की भले ही हम जमीन के अंदर सुरक्षा न कर पाऐ हों लेकिन वह जब भू गर्भ से निकलकर ऊपर आई तो उसे पूज्य गुरुदेव का संयोग मिला और ग्राम वर्रों से उठकर यंहां शीतलधाम के इस विशाल परिसर में विराजमान है, और १६ दिवसीय यह पखवाड़ा भी भगवान आदिनाथ स्वामी की भक्ती का पखवारा चल रहा है,

प्रातः अभिषेक और शांतिमंत्रों के साथ शांतिधारा और उसके पश्चात भक्तामर महिमा के साथ अर्घ को समर्पित करना और सांयकाल 48 दीप के साथ भक्तामर पाठ करना यह भी किसी अतिशय से कम नही है, उन्होंने कहा कि स्त्रोत्र के सभी 48 काव्य अपने आप में मंत्र है, और उन मंत्रों पर भारत ही नही अपितु विदेशों में भी इसकी रिसर्च चल रही है। उन्होंने इस काव्य के रचयिता आचार्य मानतुंगाचार्य का परिचय देते हुये कहा कि वह कासी निवासी धनदेव जी एक ब्राह्मण के पुत्र थे पहले वह स्वेताम्बर जैन धर्म के साथ जुड़े लेकिन एक घटना से वह एक दिगम्वर संत के सानिध्य में आऐ और उन्होंने दि. पंथ को स्वीकार किया।भक्तामर स्त्रोत युगादी पुरूष आदिनाथ भगवान की स्तुती में आचार्य प्रवर मानतुंगाचार्य ने अपने ऊपर आऐ हुये संकट और उपसर्ग की घड़ी में चेतना की गहराइयों के साथ उनके अन्तरंग के शव्द है,

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उन्होंने आचार्य समन्तभद्र स्वामी और आचार्य कुमुदचंद्राचार्य का उल्लेख करते हुये कहा कि हम और तुम संकटों के क्षणों में कभी चेतना की गहराई में नहीं उतर पाते लेकिन जब जब भी कोई भव्य आत्माओं के ऊपर यदि कोई संकट आता है, तो वह उस प्रतिकूल समय में चेतना की गहराई में उतर कर प्रभु की भक्ती में स्वर निकालते है,वह स्वतः भक्तामर स्त्रोत्र, कल्याण मंदिर स्त्रोत्र जैसे महामंत्र वन जाते है।उन्होंने कहा कि भक्तामर स्त्रोत्र के संद्रभ में कहा कि सभी 48 काव्य आचार्य मानतुंग की भक्ती से भरे हुये है, जिसमें युगादी पुरूष आदिनाथ भगवान की स्तुती की गई है।उन्होंने आज प्रथम तीन काव्यों का शुद्ध उच्चारण एवं अर्थ वताते हुये कहा कि आचार्य प्रवरमानतुंग स्वामी इस स्त्रोत्र की आराधना में कह रहे है, कि तीर्थंकर के चरणों  चरणों में झुकते है, तो उनके मुकुट और चहरे और चमकने लगते है,

उन्होंने कहा कि धर्म के मार्ग को वताने वाला कोई नहीं अज्ञान का अंधकार फैला हुआ था, उस समय भगवान आदिनाथ के चरण इस युग के सहारा वने। जैसै किसी आदमी को तीव्र प्यास लगी हो तो एक वूंद पानी भी सहारा वन जाता है, उसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति सागर में डूव रहा हो और यदिउसे तिनके का  सहारा मिल जाता है, तो वह उस तिनके से भी अपने जीवन की रक्षा कर लेताहै।उन्होंने तीनों स्लोक का अर्थ वताते हुये उनके अर्घ समर्पित कराऐ।इस अवसर पर उन्होंने कहा कि संत और कवि का स्पंदन एक जैसा होता है, एक वार कवि चंद्रसेन ने आचार्य गुरुदेव को चित्तचोर कह दिया और आचार्य श्री मुस्कराए.. लोगों ने आचार्य श्री की मुस्कुराते हुये देखा तो तालियाँ वजा दी।

मुनि श्री ने कहा संयम के मामले में मनुष्य की कोई सानी नहीं होती लेकिन भक्ती के मामले में इनद्रों की पराकाष्ठा को कोई चलेंज नहीं कर सकता।उन्होंने तीसरे काव्य का अर्थ वताते हुये कहा कि इतने वड़े आचार्य ने अपनी लघुता को प्रगट करते हुऐ कहते है, कि जैसे कोई अवोध वालक शुक्ल पक्ष के इस वातावरण में पानी में हाथ डालकर चंद्रमा के विंव को पकडऩे की कोशिश करता है, उसी प्रकार में भी उस अवोध वालक के समान लज्जा रहित होकर आपकी भक्ती कर रहा हूं। उपरोक्त जानकारी देते हुये प्रवक्ता अविनाश जैन ने वताया वाद मुनिसंघ के सानिध्य में शेरपुरा स्थित जिनालय के नवीन भवन में वेदी का शिलान्यास कार्यक्रम में सम्मलित हुये।एवं सांयकाल पुन्हा शीतलधाम पर पहुंचे।

~ब्यूरो चीफ देवांश जैन विदिशा, मध्यप्रदेश
सम्पर्क – 7828782835 / 8989696947

श्री १००८ शीतलनाथ भगवान के गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान कल्याणको से सुशोभित भूमि भद्दलपुर, विदिशा (म.प्र.) स्थित निर्माणाधीन समोशरण मंदिर

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