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जीवन विज्ञान का प्राण तत्व संस्कार संपन्नता : आचार्य महाश्रमण

AHINSA KRANTI NEWS / RAJENDRA BOTHRA
हैदराबाद। तीर्थंकर के प्रतिनिधि, जन मानस में ज्ञान का सागर बहाने वाले, अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आज कल्पतरु भवन के महाश्रमण सभागार से अपने मंगल उद्बोधन में फरमाया कि मनुष्य के निर्माण में विद्या संस्थान का भी बड़ा योगदान रह सकता है। वर्षों तक विद्यार्थी विद्या संस्थान के संपर्क में रहता है वहां पढता है और कितना योग्य भी बनने वाला बन जाता है। माता-पिता, अभिभावक अपने बच्चों को विद्यालय में भेजते हैं।

छोटे-छोटे बच्चे विद्यालय में पहुंच जाते हैं, प्रश्न है विद्यालय में बच्चों को क्यों भेजा जाता है। हम कल्पना कर सकते हैं कि अभिभावक चाहते हैं कि हमारा बच्चा विद्या संस्थान में रहकर ज्ञान संपन्न बन जाए, विद्या का विकास हो जाए,  हमारा बच्चा आत्मनिर्भर बन जाए, कमाई करने के लिए सक्षम हो जाए।अभिभावक सोचते हैं कि विद्या संस्थान में रहकर हमारा बच्चा संस्कार संपन्न भी बन जाए। ज्ञान आत्मनिर्भरता और संस्कार संपन्नता यह तीन अपेक्षाएं विद्या संस्थानों से की जा सकती है।

प्रश्न है विद्या संस्थान इन अपेक्षाओं की संपूर्णता में कितने प्रतिशत खरे उतरते हैं। विद्यार्थी पढ़ते हैं तो ज्ञान संपन्न भी बनने वाले बनते हैं। कितने डॉक्टर बनते हैं, वकील बनते हैं, इंजीनियर बनते हैं। विद्या संस्थानों में पढ़कर कितना विकास कर लेते हैं, पैसे कमाने वाले भी बन जाते हैं और आत्मनिर्भरता भी जितने अंशों में आनी होती है आ जाती है। अब तीसरी जो अपेक्षा है संस्कार संपन्नता वह कितने अंशों में होती है, कुछ अंशों में तो होती ही होगी। जीवन विज्ञान का  प्राण तत्व है संस्कार संपन्नता अच्छी तरह से हो जाना। यह आत्मा है, मूल तत्व है कि विद्या के साथ संस्कार संपन्नता भी आ जाए। 


 आचार्यवर ने आगे फरमाते हुए कहा कि एक विचार है दूसरा आचार है। एक नदी है नदी के दो तट है, एक तट पर विचार है दूसरे तट पर आचार है बीच में नदी है। विचार आचार से मिलना चाहता है पर बीच की नदी को पार करना मुश्किल है। नदी को पार करने के लिए सेतु चाहिए। संस्कार एक सेतु है। विचार और आचार नदी के दो किनारे हो गए पुल है वह है संस्कार। विचार संस्कार के माध्यम से आचार में परिवर्तित हो सकता है, विचार अचार का मिलना हो सकता है। दोनों का माध्यम है वह संस्कार है। आदमी में, बच्चे में संस्कार अच्छे आएंगे तो उसका आचार भी अच्छा बन सकता है। जीवन विज्ञान मानो कहता है कि विद्या संस्थानों में यह सेतु बनाया जाए, संस्कारों का सेतु निर्माण किया जाए ताकि जो अच्छी-अच्छी बातें हैं वह आचार में भी परिणित हो सके। अब संस्कार का सेतू तैयार कैसे हो। छोटा सा सूत्र है ज्ञान का सार है आचार, पर सार निकले कैसे। दही में मक्खन तो है, दही का सार है मक्खन, पर मक्खन निकालने के लिए एक प्रक्रिया करनी पड़ती है, बिलोना होगा तो मक्खन आएगा। मानो यह विचार तो एक दही है, आचार वह मक्खन है, ज्ञान का सार आचार है , मक्खन पाना है तो मंथन करना पड़ेगा, वो प्रक्रिया है संस्कार।संस्कार का मंथन होगा तो आचार रूपी मक्खन प्राप्त हो सकेगा।

 पुस्तकों में ज्ञान होता है। पुस्तक पढ़ने से ज्ञान प्राप्त होता है। ज्ञान प्राप्त करने का बहुत अच्छा माध्यम है पुस्तकें पढ़ना। पुस्तक को मित्र के रूप में भी देखा जा सकता है और पुस्तक को किसी अंश में गुरु के रूप में भी देखा जा सकता है। अच्छी किताब पास में है और कोई बात करने वाला आए या ना आए, समय है तो किताब निकाल लो अपनी पढ़ते रहो तो अच्छी अच्छी ज्ञान की खुराक मिल सकती है। पूज्यप्रवर ने एक दोहे के माध्यम से  समझाया कि एक गरीब के पास और तो कोई आए या ना आए पर एक श्वास है जो जब तक जीवन है आता है, जाता है। यह श्वास की बात है। पुस्तकों में बहुत ज्ञान होता है। परन्तु पुस्तकों से बहुत कुछ मिल सकता है तो फिर अध्यापक क्यों चाहिए।

पुस्तकें खरीद लो और घर में ही पढ़ लो स्कूल जाने की जरूरत क्या है। वहां यह बात है कि किसी भूमिका में तो पुस्तक ठीक है बहुत कुछ दे दे, किसी भूमिका में केवल पुस्तक से काम नहीं चलता। कोई पढ़ाने वाला चाहिए, कोई बताने वाला चाहिए। उसके लिए विद्या संस्थानों में जाना होता है, कोई गुरु चाहिए होता है। विद्यार्थी, शिक्षक और अभिभावक इन सब का योग होता है तो बच्चे में अच्छे संस्कार आ सकते हैं। शिक्षक भी ध्यान दें पालक भी ध्यान दें तो अच्छे बालक का निर्माण हो सकता है। जीवन विज्ञान एक जीने की कला है और जीने की कला की अनेक बातें हैं। ईमानदारी जीवन में आ जाती है तो मानो किसी रूप में जीवन विज्ञान का एक आयाम आ गया। बच्चों में नैतिकता वह इमानदारी के संस्कार आ जाए तो वह जीवन विज्ञान है। चोरी नहीं करना, लड़ाई झगड़ा बेकार नहीं करना, अच्छा व्यवहार रखना, अहिंसा की भावना रखना, यह संस्कार आ जाए तो जीवन विज्ञान सफल हो सकता है।

उसके लिए प्रयोग भी हैं कैसे स्वांस लेना क्योंकि शारीरिक विकास भी चाहिए, बौद्धिक विकास भी होना चाहिए और साथ-साथ मानसिक विकास और भावात्मक विकास भी होना चाहिए। बौद्धिक क्षमता बढ़े अच्छी बात है साथ में भावात्मक शुद्धि भी बढ़नी चाहिए।आज अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह के अंतर्गत दूसरा दिन जीवन विज्ञान दिवस हैं। जीवन विज्ञान जीने की कला का विज्ञान है। जीवन विज्ञान के प्रयोगों में महाप्राण ध्वनि एक बहुत अच्छा प्रयोग है। पूज्यप्रवर ने महाप्राण ध्वनि का प्रयोग सभी श्रावकों को करवाया। ऐसे कुछ प्रयोग बच्चे करते रहे, उनकी मानसिक स्थिति अच्छी रहे, भाव शुद्धि हो सके, अच्छी प्रेरणाएं मिले अच्छे संस्कार मिले। यह मानो जीवन विज्ञान का परिवार है। प्रयोग भी है, प्रशिक्षण है और कुछ शिक्षा – प्रशिक्षा दी जाए तो एक अच्छी पीढ़ी का निर्माण हो सके। हमारे यहां समाज में बच्चों की ज्ञानशालाएं भी चलती है। ज्ञानशाला भी एक बाल पीढी के निर्माण का उपक्रम है। अच्छा निर्माण होता रहे और हमारी विभिन्न संस्थाएं भी अपने-अपने ढंग से काम करती है। आज यह जीवन विज्ञान दिवस है। जीने की कला, अध्यात्मिक कला, धर्म कला, नैतिकता जैसे संस्कारों का विकास हो यह काम्य है।

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