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जीवन में ज्ञान की गहराई व चारित्र की ऊंचाई हो : आचार्य महाश्रमण

AHINSA KRANTI / RAJENDRA BOTHRA
हैदराबाद। अपनी पावन वाणी से ज्ञान गंगा बहाने वाले तेरापंथ के ग्याहरवें अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आज प्रभात कालीन प्रवचन कार्यक्रम में श्रावक-श्राविकाआें को प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा – आदमी के भीतर ज्ञान की गहराई और चारित्र की ऊंचाई होनी चाहिए। जैन आगम ठाणं में जंबूद्वीप के पर्वतों का उल्लेख मिलता है। पर्वत में ऊंचाई होती है और हम अगर समुद्र को देखें उसमें कितनी गहराई होती है।

परंतु किसी एक में दोनों गुण नहीं है, एक ऊंचा है तो एक गहरा है। मनुष्य एक ऐसा तत्व है प्राणी है जो पर्वत को भी लांघ सकता है और समुद्र को भी लांघ सकता है। कुछ व्यक्ति इतनी विशिष्टता वाले होते हैं। मनस्वी व्यक्तियों में यह दोनों गुण होते हैं। हमारे आराध्य आचार्य भिक्षु के लिए कहा जाता है उनकी साधना की ऊंचाई मेरु पर्वत सी थी वहीं उनमें सागर सी गहराई थी। प्रश्न होता है क्या ऊंचाई का मतलब आकार से है, नहीं। यह सब तो बाह्य है। व्यक्ति में भीतर ज्ञान की गंभीरता हो। व्यक्ति जब ज्ञान की गहराई में डुबकी लगाता है वह गहन तत्वों को जान लेता है। बिना शास्त्रों के वह ज्ञान प्राप्त कर लेता है। केवलज्ञानी के पास तो अनंत ज्ञान होता है।

महान ज्ञानराशि धारक चतुर्दश पूर्वी आचार्य भी हुए हैं।व्यक्ति जितना हो सके तत्व को समझ कर शब्द के हार्द को पकड़ने का प्रयास करें। सिर्फ शास्त्र पढ़ें ही नहीं उसके भीतर उतर जायें। समाचार पत्र, पत्रिकाएं, राजनीति आदि सामान्य ज्ञान है। शास्त्रों में, आगमों में ऐसी-ऐसी बातें हैं जो सामान्य व्यक्ति नहीं जानता। उन्हें समय निकालकर पढ़ने का प्रयास करना चाहिए। कुछ अंशों में ही सही, ज्ञान की गहराई पाने का प्रयास तो करें।महातपस्वी गुरुदेव ने आगे कहा कि उन्नत आचरण से व्यक्ति ऊंचा बनता है। चरित्र से, विचारों की उदारता से जीवन में ऊंचाई आती है। एक व्यक्ति इतना ईमानदार कि कष्ट पाकर भी बेईमानी नहीं करता वह चारित्र की ऊंचाई है। कोई दिखावा नहीं, सरलता जीवन में होनी चाहिए।

जबान से नहीं हमारा कार्य बोलना चाहिए। मंच पर बैठने से ऊंचा हो गया ऐसा नहीं है व्यक्ति का कार्य उन्नत हो तो वह कहीं भी बैठा हो ऊंचा हो जाता है। व्यक्ति चिंतन करें उसका आचरण कैसा है चरित्र कैसा है। जीवन में ज्ञान की गहराई के साथ चारित्र की ऊंचाई आये यह प्रयास करें।*अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह का शुभारंभ*अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण के सानिध्य में आज अणुव्रत सप्ताह का आगाज हुआ। अणुव्रत समिति हैदराबाद द्वारा बैनर का अनावरण किया गया। इस अवसर पर अणुव्रत समिति हैदराबाद के मंत्री श्री प्रकाश भंडारी, प्रवास व्यवस्था समिति अध्यक्ष श्री महेंद्र भंडारी ने अपने विचार व्यक्त किए।

महिलाओं ने अणुव्रत गीत का संगान किया।अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी ने इस अवसर पर अपने मंगल उद्बोधन में फरमाया कि आचार्य श्री तुलसी का एक महत्वपूर्ण अवदान है अणुव्रत आंदोलन। आचार्य तुलसी एक जैनाचार्य व जैन श्वेताम्बर तेरापंथ के आचार्य थे परंतु उन्होंने मानव जाति के संदर्भ में भी कार्य किया और उनके मानव जाति संदर्भित कार्यों में एक महत्वपूर्ण कार्य अणुव्रत आंदोलन को माना जा सकता हैं। अणुव्रत यानि छोटा सा नियम। एक तरफ अणुव्रत है और एक तरफ अणुबम है। अणुव्रत मानों यह कहता है कि अणुबम का दुरुपयोग न हो, हिंसा में व्यर्थ शक्ति का नियोजन न हो। अणुव्रत एक अंकुश है अगर वह उपयोग में लिया जाएं तो दुनिया को नियंत्रण में लिया जा सकता है।

आदमी जीवन जीता है अगर उसके जीवन में लगाम नहीं तो वह विनाशकारी हो सकता है और अगर जीवन में नियंत्रण है तो जीवन ठीक रह सकता है। ठीक चलने के लिए अणुव्रत की आवश्यकता है ताकि आदमी का जीवन सुसृंखल बना रह सके। आज अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह का शुभारंभ हुआ है। सात दिनों का यह कार्यक्रम है, सात विषय भी निर्धारित है। आज का प्रथम दिवस का विषय सांप्रदायिक सौहार्द के रूप में आज का दिन है। दुनिया में और भारत में भी कितने धर्म संप्रदाय है। अनेकता में एकता भारत की विशेषता।

अगर सौहार्द है तो अनेकता में एकता की बात चरितार्थ हो सकती है। भारत में कितने धर्म संप्रदाय है संप्रदाय के मुखिया कम से कम अपने  अनुयायियों को यदा – कदा  धर्म की प्रेरणा देते रहे। नैतिकता, अहिंसा, सद्भावना की प्रेरणा दी जाती रहे,अपने अनुयायियों को अच्छा बनाती रहे तो भारत कितना अच्छा बन सकता है। यह अपेक्षित है कि भारत में नैतिकता का विकास अच्छा रहे, शिक्षा का विकास हो और आध्यात्मिक चेतना का भी विकास होता रहे। विभिन्न संप्रदायों के वेश भले अलग-अलग हो पर आपस में द्वेष न फैले। संप्रदाय भले हो सांप्रदायिक उन्माद न हों। तो अणुव्रत के प्रति जीवन में चेतना जागृत हो व प्रेरणा बढ़े।

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