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जिनवाणी पर रखें पूर्ण निष्ठा : आचार्य महाश्रमण

AHINSA KRANTI NEWS / RAJENDRA BOTHRA

हैदराबाद। 21 सितंबर2020। वीतराग की वाणी से जन जन को लाभान्वित करने वाले, अहिंसा यात्रा प्रणेता, आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आज अपने मंगल उद्बोधन में फरमाया कि ठाणं आगम के सातवें अध्याय में प्रवचन निन्हव का प्रसंग चल रहा है।पांचवें जो प्रवचन निन्हव हुए उनका नाम था आचार्य गंग। इनका सिद्धांत था देक्रियवाद। इस सिद्धांत की उत्पति का स्थान उल्लुकातीर नगर था। भगवन महावीर निर्वाण के २२८ वर्ष बाद आचार्य गंग खेडा से उल्लुकातीर नगर अपने आचार्य धनगुप्त के दर्शन करने जा रहे थे। रास्ते में उन्हें नदी पार करनी पड़ी।

आचार्य गंग को धूप तेज होने के कारण सिर में गर्मी का अनुभव हो रहा था जबकि ठंडे पानी की ठंड का अनुभव। उस समय उनके मन में आया कि एक साथ दो क्रियाएं हो रही है। आगम में तो कहा गया है कि दो क्रियाएं एक नहीं होती है जबकि में स्वयं इसका प्रत्यक्ष अनुभव कर रहा हूं। तब उन्हें लगा की भगवान महावीर का यह सिद्धांत गलत है कि एक साथ दो योगों का प्रवर्तन नहीं हो सकता। इस विचार से वे विमत बन गए और बोले अब मेरा सिद्धांत है कि एक साथ दो क्रियाएं हो सकती है। उनके दिमाग में यह बात बैठ गई।

उनके दिमाग में जो स्फुरणा हुई उससे लगता है उनका दिमाग तेज तो था, वे बुद्धिमान आचार्य तो थे तभी उनके विचार में भेद भी हुआ। विचारभेद होना बुद्धिमत्ता का लक्षण है। शिक्षक के सामने बैठे विद्यार्थियों के सामने या तो विषय का सही सपष्टीकरण होने से तर्क की गुंजाईश नहीं रहती या फिर सब अज्ञानी होते है। जिस विद्यार्थी में तर्क करने की  क्षमता हो वह एक योग्य विद्यार्थी की श्रेणी में आ सकता है। नदी पार कर आचार्य गंग उल्लुकातीर नगर पहुंचे। आचार्य गंग ने  आचार्य धनगुप्त के दर्शन कर जब अपनी बात गुरू के समक्ष रखी तो गुरू ने बतलाया की समय का भाग बड़ा सूक्ष्म होता है, मन का भी सूक्ष्म संवेदन हो सकता है।

अतः जिनवाणी पर कोई संशय नहीं होना चाहिए और हमें इस सत्य को निशंक बना द्वेक्रियावाद सिद्धांत को अस्वीकार कर देना चाहिए । लेकिन आचार्य गंग अपने जिद्द पर अड़े रहे बोले नहीं मुझे ये सिद्धांत स्वीकार्य नहीं है। तब आचार्य सिधगुप्त बोले आगम की बात नहीं मान रहे हो इसलिए में तुम्हे संघ से अलग करता हूं। वहां से अलग विचरते हुए आचार्य गंग राजगृह में आए। वहां महातप:तीर नामक झरने के चैत्य में ठहरे। वह एक मणिनाग का चैत्य था। लोग प्रवचन सुनने आये और गंग ने द्वेक्रियवाद सिद्धांत की बात बताई। आगम विरूद्ध बात सुनकर मणिनाग ने परिषद के बीच में उसे कड़े शब्दों में कहा – हे दुष्ट !

तूं भगवान के विरूद्ध जाकर गलत सिद्धांत की बात क्यों कर रहा है। इसी स्थान पर भगवान महावीर ने इस सिद्धांत का विवेचन किया था कि एक समय में एक ही क्रिया होती हैं। तुम आज उसके विपरीत बात कह रहा है क्या तुम भगवान से ज्यादा ज्ञानी हो। आचार्य गंग थोडा प्रकंपित हो गये, सोचा मैने ठीक बात नहीं की, भगवान के विरूद्ध बात कर दी। अपनी भूल का अहसास होने पर आचार्य गंग वापिस अपने गुरु के पास गए और बोले मैने गलत सिद्धांत की बात कर दी, मुझे प्रायश्चित करना है। प्रायश्चित लेकर वह  पुनः संघ में आ गए। पूज्य प्रवर ने आगे प्रेरणा देते हुए फरमाया कि हमारी एक निष्ठा यह बनी रहे कि मेरे दिमाग में जो बात है वो सही है या नहीं है पर भगवान ने जो बात बताई है वह सत्य ही है। हमारी श्रद्धा बनी रहे कि वीतराग व केवली की जो वाणी है वह सत्य ही है। ध्यान देने की बात है कि मनोयोग, वचनयोग व काययोग, इन तीनों में से कोई भी दो योग एक साथ नहीं हो सकते व एक योग में शुभ और अशुभ योग भी एक साथ नहीं हो सकते, यह सिद्धांत की बात है।

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