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जयकारा के साथ देवेंद्रसागरजी का भव्यतम चातुर्मास प्रवेश सम्पन्न


बैंगलोर । आचार्य श्री देवेंद्रसागरजी मुनि श्री महापद्मसागरजी एवं साध्वी वर्या मोक्षज्योति म.सा. का चातुर्मास प्रवेश शुक्रवार को अक्कीपेट श्री वासुपूज्यस्वामी जैन मूर्तिपूजक संघ में भव्योल्लास के साथ सम्पन्न हुआ।  इससे पूर्व प्रवेश यात्रा अक्किपेट मंदिर से प्रातः ७ बजे निकलकर मुख्य राजमार्गो  से होते हुए पुनः वासुपूज्य जैन मंदिर पहुँची ।  बालिका मंडल. जैन नवयुवक मंडल मंदिर के ट्रस्टीगणो ने महाराज श्री का स्वागत किया. मंदिर पहुँचने पर धर्मसभा की आलीशान तैयारी की गई थी. धर्मसभा में संगितमर गुरुभक्ति की प्रस्तुति दी गई पश्चात संघपूजन भी कीया गया. प्रवेश के इस सुहावने अवसर पर जैन संघ के प्रमुख श्री उत्तम जी ने प्रासंगिग उद्बोधन किया  और कोलकाता मुंबई सूरत अहमदाबाद नागपुर बेलगाम कोल्हापुर पूना आदी गामो से पधारे हुए गुरुभक्तो का स्वागत किया .

प्रवेश यात्रा में आचार्य श्री ससंघ शामिल थे. हाथो में ध्वज लिए श्रद्धालु जयकारा लगाते हुए चल रहे थे..  मंदिर पहुँचने के बाद आचार्य श्री ने धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए कहा की जैन धर्म पूर्णत: अहिंसा पर आधारित है। जैन धर्म में जीवों के प्रति शून्य हिंसा पर जोर दिया जाता है। वर्षा ऋतु में अनंत जीवों की उत्पत्ति होती है। ऐसे में साधु-संतों के अधिक चलने-उठने से जीवों को अधिक नुकसान पहुंचता है। इसलिए साधु-संत चार माह तक एक ही स्थान पर विराजमान होकर ज्ञान, ध्यान, तपस्या में लीन हो जाते हैं। चातुर्मास के चार माह आषाढ़, सावन, भादो, आश्विन-कार्तिक ही धर्म प्रभावना के लिए उपयुक्त हैं। आषाढ़ कहता है-आलस्य प्रमाद छोड़ो, वरना आलस्य तुम्हारी साधना समाप्त कर देगा। सावन कहता है-संतों का श्रवण करो, श्रम करो, श्रावक बनो। भादो कहता है-भद्र और सरल बनो। आश्विन-कार्तिक कहता है- धर्म मार्गी नहीं बने तो सुख-पुण्य से वंचित रह जाओगे। स्वर्ण अवसर हाथ में है, इसका सदुपयोग करो।

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