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गुरु वे है जो जीवों को पापों से उबारते हैं : आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर म. सा

AHINSA KRANTI NEWS

मैसूर । दि. 26 सितम्बर 2020 श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य विजय भव्यदर्शन सूरीश्वरजी म. ने धर्म संदेश में बताया कि –  गुरुप्रदक्षिणा कुलक नाम के प्राकृत ग्रंथ में लिखा है – वह हाथ कुतार्थ है, जिसने सद्गुरु के चरणों में वंदन के जरिए स्पर्श किया है, वह जिह्वा (जीभ) बहुगुण सम्पन्न है, जिसने सद्गुरु के गुणों का कीर्तन-गुणगान किया है । गुरु वे है जो शिष्यों का, अनुयायीओं का कल्याण की कामना करते हुए प्रेरकबल बनते है । गुरु वे है जो निःस्वार्थ परोपकार करने में तत्पर हैं । गुरु वे है जो अपकार करनेवाले को भी दुश्मन नहीं मानते हैं ।

गुरु वे है जो अपने द्वेषी से भी प्रेम करते है । गुरु वे है जो क्षमा के भंडार है । गुरु वे है जो अमृत जैसी मीठ़ी वाणी से जीव को जगाते है, मोह की निंद में से उठ़ाते हैं । गुरु वे है जो जीवों को पापों से उबारते हैं ।ऐसे गुरुवरों की सेवा महान पुण्योदयवाले को ही प्राप्त होती है । ऐसे गुरुभगवंत अपने लिए भगवान की गैर हाजरी में भगवान के समकक्ष है । भगवान की प्रतिकृति है । ऐसे गुरु की सेवा जी-जान के साथ करनी चाहिए । ऐसे गुरु के लिए तो जान की बाज़ी भी लगा दें तो कम है । गुरु तो माता का, पिता का, भाइ का… सब के कार्य करते है । मतलब यह हुआ कि गुरु महाराज हरएक स्वरूप का कार्य करते है . इतने कार्य करने पर भी कोई अपेक्षा नहीं रखते है । बदले की भावना कभी उनके दिल में नहीं होती ।

सब कार्य निःस्वार्थ करते हैं ।जहाँ निकम्मे लोग रहते है, जहाँ दोष-दुर्गुणों से भरेपूरे लोग बसते है, जहाँ स्वार्थी, क्रोधादि कषायों के कलुषित भाव वाले लोग निवास करते है… वहीं पर ही गुरु भगवंत रहते है फिर भी कोई दोष अपने को न लग जाये उसकी सावधानी के साथ दोष-दुर्गुणों से भरे हुए लोगों को सुधारने का कार्य वो करते है । उन लोगों के दिल में अमिर छाप छोड़के जाते है । संसारी इन्सान में यह दोष मिलेगा – कहता है अलग… करता है अलग । करनी और कथनी में अलग-थलग दिखता है । अराजकता और अंधाधुंध नज़र आती है, जबकि गुरु भगवंत की कथनी और करनी में साम्यता होती है । हाथी के भांति दिखाने का और चबाने का दांत अलग नहीं होते है ।

शास्त्र में गुरु का वर्णन करते हुए लिखा है – किसी के दोष – दुर्गुणों को दूसरे को न कहनेवाले, सौम्य आकृतिवाले, समुदाय के लिए जरूरी वस्त्र-पात्र-किताब वगैरह का संग्रह करनेवाले, हर विषय को समझने की तीव्र बुद्धिवाले, अपनी प्रशंसा नहीं करनेवाले, चंचलता रहित, मितभाषी और प्रसन्न हृदयवालें गुरु होते हैं । महोपाध्याय श्री यशोविजयजी म. नवपद की पूजा के काव्य में लिखते है । जो सुख हमको माता-पिता नहीं देते हैं, वह सुख हमको जिनशासन के आचार्यभगवंत (गुरु) देते है । एक जगह ऐसा भी लिखा है कि जिस तरह इन्द्र देवताओं को, चन्द्रमा ताराओं को, राजा प्रजाजनों को सुख प्रदान करता है – उसी तरह गुरु अपने गच्छ में शिष्यों को आनंद दिया करते हैं । ऐसे गुरुभगवंत की आशातना-अनादर करनेवाला, निंदा करनेवाला, उनके साथ कलह करनेवाला, उनके प्रतिद्वेष रखनेवाला, उनकी आज्ञा न मानने वाला कई बार नरकादि दुर्गति में भटकता रहता है ।

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