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किया है उस *आत्मा को सफल बनाने का सही मार्ग ही तप है/ पीयूष चंद्र विजय म. सा / अहिंसा क्रांति

अहिंसा क्रांति / विक्रम सुराणा

मुंबई महानगर के कामाठीपुरा गली 8 में चल रही चातुर्मासिक आराधना के दौरान प्रवचन में पूज्य गुरुदेव श्री पीयूषचंद्र विजयजी म.सा. ने बताया कि प्रभु के द्वारा जो हमारे इस शरीर में प्राण , आत्मा,का सजर्न प्रभु के द्वारा किया है उस *आत्मा को सफल बनाने का सही मार्ग ही तप है धर्म को समझने का* , मोक्ष के प्राप्त करने का मार्ग ही तप है, तप बिना आत्मा का कल्याण नहीं किया जा सकता यह बात गुरुदेव ने कहीं साथ ही गुरुदेव ने बताया कि जिस भी व्यक्ति के पास तीन चीजें धारण किये हुए रहता है उसके समक्ष सभी झुकते हैं,

इन 3 कार्य के कारण ही व्यक्ति के सही जीवन का निर्माण होता है यह तीन कार्य मुख्यतः अहिंसा -सभी जीवो के प्रति करुणा मैत्री भाव ,संयम- यानी कि नियंत्रण अपने आत्मा पर, नियंत्रण क्रोध के ऊपर आदि के ऊपर संयम के 17 रूप को बताया गया है , तीसरा सबसे महत्वपूर्ण तप- तपस्वी जिसके समक्ष सभी झुकते* हैं व्यक्ति के द्वारा यह तीनों चीजें जो भी व्यक्ति सही रूप से पालन करता है उसके समक्ष देव- देवी मनुष्य सभी झुकते हैं एवं साथ ही गुरुदेव ने बताया कि *बिना जानकारी किया गया कार्य नुकसानदायक रहता है ,उदाहरण देते हुए समझाया कि अभिमन्यु जिसने गर्भ में ही चक्रव्यूह के अंदर जाने का मार्ग समझ लिया था परंतु बाहर आने* का उसे नहीं पता था इसी कारण वश वह जोश में वह अंदर तो चला गया परंतु चक्रव्यूह से बाहर आना सका इसलिए कभी भी बिना संपूर्ण जानकारी कोई भी कार्य ना करें वरना बाद में पछताना ही पड़ता है

एवं साथ ही कभी भी धर्म करें चाहे बली छोटा करें या बड़ा करें परंतु विधि विधान से ही करें, अविधि पूर्वक गया धर्म कभी फलदायक नहीं रहता है एवं साथ ही गुरुदेव ने *तप की महिमा* बताते हुए विस्तृत रूप से बताया कि *नाग केतू नाम का एक छोटा सा बालक था* जिसे *जन्म लिए हुए 3 दिन* हुए थे तप की भावना हुई उसने अट्ठम जैसा बड़ा तप किया तप का यह प्रभाव हुआ की *धरनेंद्र नागराज स्वयं* उसे आशीर्वाद देने पहुंचे एवं *उसे पारणा कराया* ऐसा प्रभाव होता है तप का ,एवं गुरुदेव ने बताया कि *प्रार्थना में बहुत ही शक्ति होती है* सही मन से कि गई प्रार्थना अवश्य ही बहुत फलदायक होती है उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया की शिल्पी जिसने प्रभु *शंखेश्वर पारसनाथ भगवान की प्रतिमा का निर्माण* किया सर्वप्रथम निर्माण करने से पहले उसने अपने *कुल की देवी की आराधना की एवं उनसे प्रार्थना की* एवं 3 दिन तक अट्टठम की तपस्या की एवं उस तपस्या एवं प्रार्थना के प्रभाव से स्वयं देवी मां उसके सामने *प्रत्यक्ष प्रकट हुई* दर्शन दिए उसे मूर्ति निर्माण के लिए आशीर्वाद दिया

जिसके कारण से उसके द्वारा बनाई गई मूर्ति आषाढी *श्रावक जिसने मूर्ति निर्माण का काम सौंपा था उसे पसंद आई ऐसी शक्ति होती है* *साधना से बड़े से बड़ा काम भी आसानी से संपूर्ण हो* जाता है एवं गुरुदेव ने श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ भगवान की महिमा बताते हुए उनके चमत्कारों को सबसे अवगत कराया एवं गुरुदेव ने *स्वर्ग लोक में रहे हुए देवी देवताओं के जीवन* , एवं उनके काल के बारे में विस्तृत रूप से समझाया कि *उनका आयुष कितना होता है क्या खाते हैं कितना सोते हैं* सब कुछ एवं साथ में गुरुदेव ने मार्मिक वचन के माध्यम से समझाया कि कभी भी जीवन में किसी का भी दिल मत दुखा ओ, सदैव मन में प्रसन्नता रखो

मुनिराज *श्री पद्मविमल विजयजी महाराज साहेब* ने बताया कि परमात्मा को समझना जरूरी है ,परमात्मा क्या है एक बार परमात्मा को समझ लिया तो कभी भी हम मार्ग से भटक नहीं पाएंगे परमात्मा ही हमारे जीवन का निर्माण करते हैं

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