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कल्याण मार्ग के लिए दृष्टि ही नहीं खुलेगी तो कल्याण मार्ग के लिए पुरुषार्थ कहां से होगा ? : आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर म. सा

AHINSA KRANTI NEWS

मैसूर ।  श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य विजय भव्यदर्शन सूरीश्वरजी म. ने धर्म संदेश में बताया कि –  हमारे दिल में भावना उठ़नी चाहिए कि – ‘सर्वे पि सुखिनः सन्तु’ अर्थात्  सब जीव सुखी बनें, सब जीवों की सुख की प्राप्ति हो । कोई जीव दुःखी न हो । अपने इर्द-गीर्द अगर कोई जीव दुःखी रहेगा, उसके मुँह से चीखें नीकलती होगी, वे हमारे कान में सुनाई देती हो… वेदना और दर्दसे वो हाथ-पैर पटकता हो, पीड़ा से उछल-कूद करता हो… कोई मार-पीट होती हो… हाँ, वो बच्चा हो, युवान हो या बुढ़ा हो… वह देखते-सुनते हम सुखी कैसे हो सकते ? हम भी गमगीन बन जायेंगे । वह दर्द हमको भी पीड़ित कर देगा । कितनी भी सुख की सामग्री के बीच बैठे हो.. हमे सुख-चैन नहीं मिलेगा ।

सुख की सामग्री के बीच रहनेवाले सुखी ही होते है, ऐसा नहीं कह सकते । बाह्य सामग्री हो न हो भीतर की सोच अगर सही है तो ही सुख-आनंद प्राप्त होगा । बाह्य सामग्री की अपेक्षा रखनेवाला कभी आनंद की अनुभूति नहीं कर पाता । क्योंकि सामग्री से आनंद मिलता है यह मान्यता ही मिथ्या है । सामग्री पुद्गल की होती है । पुद्गल तो सड़नेवाला-नष्ट होनेवाला होता है । हमेशा वो टिकता नहीं है । पुद्गल का राग ही जीव को दुःखी बनाता है ।सबके सुख में मेरा सुख यह भावना आपके दिल में जब आयेगी तब आप खुद के दुःख दूर करके सुख पाने का नहीं दूसरे के दुःख दूर करके सुखी बनाने के लिए तड़पते होंगे ।दूसरी भावना – ‘सर्वे सन्तु निरायमाः’ यानी सब जीव रोग रहित हो । किसीको कोई भी बीमारी न हो । हरकोई निरोगी हो ।

बीमार व्यक्ति सुखी कहां से होगा ?  बीमार व्यक्ति के पास कितने भी पैसे हो, खाने पीने की भरपूर सामग्री हो… रहने के लिए आलिशान बंगला हो, ढ़ेर सारी सुविधाएं उपलब्ध हो… परिवार भी बड़ा और अनुकूल हो किंतु अपने शरीर में बीमारी के कारण मजा न हो तो क्यां करना ? तब तो कहा जाता है कि – पहला सुख है निरोगी काया । जैन शास्त्रों की माने तो मानवदेह में 5,68,99,584 रोग है । कौनसा रोग कब अपना सर उठ़ायेगा ? पता नहीं चलेगा । एक रोग आने पर भी हम हिल जाते है । अनेक रोग या बड़ी बीमारी पर तो क्या होगा ?तीसरी भावना – ‘सर्वे भद्राणि पश्यन्तु’ सब जीवों कल्याण के कामी बनों सब कल्याण की दृष्टिवाले हों ।

कल्याण की कामना करनेवाले के दिल में कभी किसी के प्रति दुर्भावना नहीं उठ़ती । क्योंकि-दुष्ट भावना कल्याण में बाधक बनती है । अलबत्ता, ऐसी शुभ भावना सज्जनों के दिल में ही उठ़ती है, दुर्जनो के दिल में नहीं । कल्याण मार्ग के लिए दृष्टि ही नहीं खुलेगी तो कल्याण मार्ग के लिए पुरुषार्थ कहां से होगा ?चौथी भावना – ‘मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्’ मतलब, कोई भी जीव दुःखी न हो । अनेक सुखों के बीज एक दुःख आता है तो इन्सान हैरान हो जाता है । इसलिए यहाँ भावना दिखाई है – कोई जीव के जीवन में, कोई भी प्रकार का दुःख न हो… इस भावना का गर्भित आशय समझने जैसा है – दुःख पाप के बिना नहीं आता । पाप का उदय हो और दुःख न हो, यह संभवित नहीं है । मतलब यह हुआ कि – कोईजीव पाप न करों । पाप न करनेवाला कभी दुःखी नहीं होगा । पाप न करनेवाले के जीवन में दुःख कहां से आयेगा ? गुनाह ही नहीं किया तो सजा कैसे मिलेगी ? 

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