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कर्मों से होती है व्यक्तित्व की पहचान : आचार्य महाश्रमण

AHINSA KRANTI NEWS

हैदराबाद। अध्यात्म जगत के महासूर्य अहिंसा यात्रा प्रणेता परमपूज्य आचार्य श्री महाश्रमण ने आज यहा धर्म सभा में श्रद्धालुओं को पावन प्रवचन फरमाते हुए कहा- जैन दर्शन में कर्मवाद पर अच्छा प्रकाश डाला गया है। कर्मों के आठ प्रकार हैं- ज्ञानावरणीय कर्म, दर्शनावरणीय कर्म, वेदनीय कर्म, मोहनीय कर्म, आयुष्य कर्म, नाम कर्म, गोत्र कर्म एवं अन्तराय कर्म।  जितने भी संसारी जीव हैं सभी के इन आठ कर्मों का बंध होता ही है।

केवल जो उसी जन्म में मोक्ष जाने वाले होते हैं उनके सात कर्मों व चार कर्मों की स्थिति आती है। बाकी जो मोक्ष नहीं जाते उनके सभी आठ कर्म बंधते हैं। कर्मों के आधार पर आदमी के व्यक्तित्व की, जीवन की व्याख्या की जा सकती है कि कौन कैसा है। एक व्यक्ति बुद्धिमान है, विद्वान है, ज्ञान का भी उसमें विकास है तो मानना चाहिए की उसके ज्ञानावरणीय – दर्शनावरणीय कर्म का क्षयोपशम है। उनके हल्के हुए बिना बौद्धिकता का विकास संभव नहीं है। हम देखे पूज्य गुरुदेव तुलसी के ज्ञानावरणीय का कितना क्षयोपशम था। कितने-कितने ग्रंथ उन्हें याद थे, 20 हजार  से अधिक गाथा प्रमाण उन्हें कंठस्थ था। आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी में भी कितना वैदुष्य था। प्रतिभा होती है तो ज्ञान ग्रहण हो सकता है। ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से ही यह क्षमता आती है। इससे विद्वत्ता और प्रखरता को प्राप्त करती है। कुछ बच्चे होते हैं जो पढ़ नहीं पाते, न उन्हें किसी प्रकार की समझ होती है। यानि वह ज्ञानावरणीय कर्म का सघन उदय हुआ है।


ज्योतिचरण गुरुदेव ने आगे कहा कि-एक व्यक्ति शरीर का शरीर बिल्कुल स्वस्थ एवं सुडोल है, वह सुंदर भी है। कह सकते हैं वहा सात वेदनीय, शुभ नाम कर्म का उदय है। वहीं एक व्यक्ति बीमार रहता है, स्वस्थ शरीर नहीं वहां असात वेदनीय, अशुभ नाम कर्म का उदय है। व्यक्ति शांत स्वभाव का हो, विशेष क्रोध भी नहीं करता कोई कुछ भी बोले लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं, समता है। यानी उसके मोहनीय कर्म, कषाय गुस्से का भाग शांत है। क्षयोपशम है तो गुस्सा नहीं आता। क्रोधी व्यक्ति के मोहनीय कर्म की प्रबलता होती है।

यूं व्यक्तित्व का विभाजन मोहनीय कर्म के आलोक में किया जा सकता है। एक आदमी के वचन का प्रभाव होता है, लोग उसकी बात मानते हैं वहीं एक आदमी जब बोलता है कोई नहीं सुनता, यह सब शुभ नाम कर्म का फर्क है (एक के शुभ नाम आदेय वचन है एक के अनादेय वचन) यूं कितने-कितने रूपों में व्यक्तित्व पर कर्मों का प्रभाव है। कर्मों का क्षयोपशम कैसे करें इस पर व्यक्ति ध्यान दें। मोहनीय कर्म कैसे हल्का हो। क्योंकि पाप कर्मों को बंधाने में मोहनिय का बड़ा योग है। यह कमजोर हो तो सारी समस्याओं का समाधान हो सकता है। हमारी वृत्तियां शांत हो। आचरण में अहंकार, लोभ, छल कपट न हो। जीवन में सरलता अपनाने का व्यक्ति प्रयास करें। कषाय आदि को शांत कर व्यक्ति अपने जीवन को अच्छा बना सकता है।


आज पूज्य आचार्य श्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में तेरापंथ प्रोफेशनल फोरम के राष्ट्रीय अधिवेशन का आगाज हुआ। इस अवसर पर टीपीएफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री निर्मल कोटेचा, चयनित अध्यक्ष श्री नवीन पारख, चातुर्मास व्यवस्था समिति अध्यक्ष श्री महेंद्र भंडारी, ऋषभ दुगड ने अपने विचार व्यक्त किए। दो दिवसीय AI-आध्यात्मिक इंटेलिजेंस थीम पर आयोजित होने वाले इस वर्चुअल अधिवेशन में देशभर से 1500 से अधिक प्रोफेशनल भाग लेंगे।

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