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अशुभ विचारों व अशुभ क्रियाओं का त्याग उपवास से भी वड़ा उपवास है : मुनि श्री समता सागर जी महाराज

अहिंसा क्रांति /ब्यूरो चीफ देवांश जैन

विदिशा(भद्दलपुर) – भोजन का उपवास करो या न करो लेकिन अशुभ विचारों का और अशुभ क्रिआओं का त्याग तो सभी को करना ही करना चाहिये, यह उपवास से भी वड़ा उपवास है, उपरोक्त उदगार मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने प्रातःकालीन प्रवचन सभा में व्यक्त कियेउन्होंने कहा कि इसका आशय यह मत लगा लैना कि चलो अच्छा है, जब महाराज श्री ने व्रत और उपवास करने का मना कर दिया तो फिर हम व्रत उपवास क्यू करें? काय को इस शरीर को कष्ट दें, उन्होंने कहा कि अकेले भोजन का त्याग करने का नाम उपवास नहीं है, यदि आपने भोजन का तो त्याग कर उपवास कर लिया लेकिन “अशुभ विचारों और अशुभ क्रिआओं का त्याग नहीं किया तो ऐसे उपवास का कोई भी फल मिलने वाला नहीं !

उन्होंने कहा कि एक स्थान पर तीर्थंकरों के अतिशयों पर मेरा प्रवचन चल रहा था और एक जैनेतर भाई पत्रकार ने प्रश्न कर दिया महाराज श्री आपने वताया कि तीर्थंकरों के आगमन के पहले ही चारों और हरयाली और खुशहाली छा जाती है, और रत्नों की वर्षा होती है, और किसी भी प्रकार से कोई भी रोग मरीक्ष दुर्भीक्ष नहीं फैलते तो हमारा प्रश्न यह हैकि भगवान महावीर को गये तो अभी मात्र 2600 वर्ष ही हुये है, तो अभी जब खुदाई हुई थी तो जो रत्नों की वर्षा हुई थी वह भी मिलना चाहिये और यंहा पर किसी भी प्रकार से रोग आदि व्याधी नहीं होंना चाहिये? का जवाब देते हुये मुनि श्री ने कहा कि जैसे चकर्वती की नौ निधियां और नौ रत्न चकर्वती के पुण्य योग से एवं उनके नियोग से उत्पन्न होती है,और जैसे ही चकर्वती ने दीक्षा ली  वह निधियां और संपदा जिस नियोग से आई थी उसी नियोग से स्वमेव लोप हो जाती है,

चकृवर्ती दीक्षा लेता है,तो वह अपने राज्य का तो राज तिलक कर सकता है, लेकिन उन निधिओं और संपदा को चकर्वती अपने वेटे को भी नहीं सोंप सकता क्युकी वह निधियाँ और वह संपदा तो उसे चकर्वती के नियोग से ही मिली थी, उसी प्रकार जिस समय तक तीर्थंकर भगवान विराजमान रहते है, तब ही तक उन रत्नों का और उस संपदा का जो तीर्थंकर के निमित्त और नियोग से जो रत्नों की वर्षा हुई, उसका उपयोग तीर्थंकर के रहते हुये तक तो कोई भी कर सकता है, और उसका लाभ प्रजा को मिलता भी है, लेकिन जैसे ही भगवान का मोक्ष होता है, तो उनका समवसरण भी स्वमेव छिन्न भिन्न हो जाता है, और जो संपदा और रत्नों की वर्षा या जो अतिशय तीर्थंकर के निमित्त से उत्पन्न हुये थे वह रत्न और संपदा तथा उनके अतिशय भी साथ ही चलेजाते है।

उन्होंने तीर्थंकर की माता के १६ स्वपनों की वात करते हुये कहा कि उनको जो सपने आते है वह सपने इतने शुद्ध , सात्विक और फलदायी होते है, उसका लाभ तीर्थंकर के पुण्य नियोग से तीर्थंकर प्रभु के गर्भ मेंआने के छै माह पहले से ही रत्नों की वर्षा शुरू हो जाती है, इससे नगर की दरिद्रता समाप्त हो जाती है,और  यह वर्षा एक वार नहीं वल्कि प्रतिदिन दिन में चार वार होती है, एकवार में साड़े तीन करोड़ रत्न वरसते है! यह तीर्थंकर का पुण्य है और उन्ही के योग से रत्नों की वर्षा होती है एवं उसका उपयोग नगरवासी करते है। उन्होंने कहा कि सात्विकता का फल सदैव सात्विक ही मिलता है, जैसे आप जिस दिन शुद्ध भोजन करते है, तो आपको सपने भी १६ के ही आते है, अशुद्ध या भयानक सपने नहीं आते, उसी प्रकार जिस जीव की जैसी पुण्य प्रकृति होती है, उसी अनुरुप उसके फल भी नजर आते है।

उपरोक्त जानकारी देते हुये श्री शीतल विहार न्यास के प्रवक्ता अविनाश जैन ने वताया मुनि श्री के द्वारा पूंछे जा रहे दो प्रश्नो का उत्तर संपूर्ण भारत से स्वाध्यायी तो स्वाध्यायी युवक एवं युवतियाँ भी इसमें हिस्सा ले रहे है। वह गूगल का उपयोग कर श्री विद्यासागर डांट काम और मुनि श्री समतासागर जी महाराज की संत शिरोमणि प्रवचन माला जो कि यू टियूवपर है, उसका उपयोग कर तुरंत जबाव भेजते है। और उनका नाम जब मुनि श्री से आशीर्वाद के रुप में निकलता है, तो उनको भी वहूत खुशी होती है। लाईव प्रवचन प्रातः 8:15 से 9 वजे तक ही रहते है, और जबाव १५ मिनट वाद ही आ जाते है। मुनि श्री ने सभी स्वाध्यायीओं को आशीर्वाद देते हुये कहा कि प्रश्नोत्तरी के माध्यम से जो स्वाध्याय होता है, वह स्मृति पटल  पर अमिट रहता है।

~ब्यूरो चीफ देवांश जैन विदिशा, मध्यप्रदेश
सम्पर्क – 7828782835 / 8989696947

श्री १००८ शीतलनाथ भगवान के गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान कल्याणको से सुशोभित भूमि भद्दलपुर, विदिशा (म.प्र.) स्थित निर्माणाधीन समोशरण मंदिर

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