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मोक्ष स्थान हमें मिले यह भावना मन में रहनी चाहिए : आचार्य महाश्रमण जी

अहिंसा क्रांति / राजेन्द्र बोथरा
हैदराबाद। ठाणं आगम में कहा गया है हमारी सृष्टि में दो ही तत्व है जीव और अजीव। जीव के लिए 84 लाख योनियों की बात प्राप्त होती है। ठाणं में सात प्रकार का योनि संग्रह बताया गया है। त्रस जीवों को यहां सात प्रकार में बांटा गया प्रतीत होता है- अंडज, पोतज, जरायुज, रसज, संस्वेदज, समुर्छिम, उद्भिज। पहला प्रकार बताया है अंडज- कुछ जीव अंडो से पैदा होते हैं, मयूर, कबूतर ,चिड़िया ऐसे प्राणी है यह अंडों से पैदा होते हैं। इनकी संज्ञा की गई है, ये अंडज त्रस प्राणी होते हैं। दूसरा प्रकार है पोतज- यानी शिशु, बच्चे के रूप में पैदा होने वाले जीव। हाथी आदि जीव शिशु के रूप में जन्म लेने वाले प्राणी होते हैं। तीसरा प्रकार है जरायुज़- जन्म के समय जो जरायू वेष्टित दशा में उत्पन्न होते हैं वे जरायुज कहलाते हैं, जैसे भैंस, गाय आदि प्राणी है। वे इस रूप में जरायू के साथ पैदा होते हैं। चौथा प्रकार है रसज- रस में पैदा होने वाले जीव,यानी यह छाछ, दही आदि रसों में जो सूक्ष्म शरीरी जीव पैदा होते हैं उनको रसज प्राणी कहा गया है। पांचवा प्रकार है संस्वेदज- जो प्राणी पसीने में पैदा होते हैं वह संस्वेदज प्राणी कहलाते हैं ।छठा प्रकार है समुर्छिम – मक्खी चिंटी यह समुर्छिम प्राणी कहलाते हैं ।ये माता-पिता विहीन होते हैं। सर्दी गर्मी आदि बाहरी कारणों से यह पैदा हो जाते हैं उनकी संज्ञा है समुर्छिम।
 सातवां प्रकार है उद्भिज- यह पृथ्वी को भेदकर उत्पन्न होते हैं ,पतंग, खंजरीत ऐसे प्राणी है जो पृथ्वी को, धरती को, भूमि को भेदकर पैदा होते हैं। यह उद्भिज प्राणी कहलाते हैं। ठाणं में यह सात प्रकार जीवों के बताए गए हैं। यह एक जैन दर्शन में जीवों का वर्गीकरण है। अब यह जो सात प्रकार है उनके लिए और आगे की बात ठाणं में बताई गई है कि यह जो सात प्रकार है जैसे अंडज है, यह जो अंडज है वह कहां से आता है और आगे मरकर कहां जाएगा। तो शास्त्रकार ने कहा कि यह अंडज आदि सात प्रकार मैंने बताए हैं, इन सातों प्रकारों में से किसी में से भी मरकर के अंडज जीव, अंडज के रूप में पैदा हो सकता है। इसी प्रकार यह जो पोतज है वह भी सातों में से किसी में से आकर पोतज बन सकते हैं यानी सातों के सातों, सातों में से ही आ सकते हैं और मृत्यु के बाद फिर सातों में से किसी में भी जा सकते हैं। यह एक सिद्धांत है।
पूर्वजन्म और पुनर्जन्म का एक सिद्धांत ठाणं के इस प्रकरण में बताया गया है। अब हमें क्या ध्यान देना चाहिए कि पूर्व जन्म में कौन कहां से आया है यह सबको पता नहीं भी चले परंतु कईयों को यह ज्ञान हो भी सकता है, किसी ज्ञानी पुरुष से पता चल सकता है या स्वस्मृति हो जाती है और वह जान लेता है कि मैं पिछले जन्म में वहां था। पूर्व जन्म का तो फिर भी पता चल जाए, स्मृति हो जाए, पर मैं जहां तक समझ पाया हूं पुनर्जन्म किसका क्या होगा ,इसकी स्मृति तो होती नहीं है ,स्मृति तो अतीत की होती है ,इसका ज्ञान होना संभवतः और ज्यादा मुश्किल है। मूल बात है पिछले जन्म में जहां थे, वहां थे ,अब हमें आगे के बारे में ध्यान देना चाहिए, ध्यान यह देना चाहिए कि मेरी दुर्गति ना हो, मैं मोक्ष की दिशा में आगे बढूं। मेरा ऐसा कोई आचरण न हो जाए कि आगे से आगे खूब जन्म मुझे लेने पड़े, वो स्थिति मेरी न बने, ऐसे पापाचार मुझे नहीं करने चाहिए, क्योंकि यहां अगर पापाचार करते हैं तो आगे के जन्मों का जो भविष्य है वह भविष्य थोड़ा खराब  हो जाएगा और आत्मा भले दिखाई ना दे परंतु सिद्धांत है कि यह वर्तमान में जो आत्मा है वह अपने आप में अमुर्त है, उसके साथ कार्मण शरीर जुड़ा हुआ है, आत्मा को आगे कार्मण शरीर रूपी वाहन ले जाता है। तो प्रश्न है हमारा कार्मण शरीर किस प्रकार का वाहन है,
वो वाहन अगर बढ़िया है तो अच्छे रास्ते पर आगे बढ़ा सकता है,एक तरह से इस वाहन को बनाने वाले हम ही हैं। मूल बात है कि जीवन के आचरण हमारे अच्छे हों, आचरण अच्छे होंगे तो हमारा कार्मण शरीर पुण्यात्मक हो सकता है ।कार्मण शरीर पुण्यात्मक भी हो सकता है और पापात्मक भी हो सकता है।पुण्यात्मक आयुष्य का बंध आगे होगा तो अच्छी गति में जाना हो सकेगा, पापात्मक आयुष्य का बंध होगा तो दुर्गति में जाना होगा। कार्मण शरीर कारण शरीर है, पुनर्जन्म का कारण यह शरीर है। तो यह कार्मण शरीर हमारा अच्छा रहे तो अगली गति अच्छी हो सकती है। इससे भी आगे की बात है, यह गति- गति, बात ही खत्म हो जाए, वापस कभी आना न हो, मोक्ष स्थान हमें मिले, यह भावना मन में रहनी चाहिए।

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