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हाथ की शोभा कंकण से नहीं दान से होती है : आचार्य भव्यदर्शन सुरीश्वर म.सा

अहिंसा क्रांति / दलीचंद श्रीश्रीमाल
मैसूर । दि.1 अगस्त 2020 श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर तथा साध्वी भद्रिकाश्रीजी म. ने प्रवचन मे बताया कि  अगर आपके पास पुण्य के उदय से लक्ष्मी प्राप्त हुई है तो दान देना चाहिए । आपको मानव का दुर्लभ जीवन मिलगया है तो कीर्ति और धर्मार्जन करने में उसका सदुपयोग करना चाहिए । कार्यक्षम शरीर मिला है तो परोपकार के कार्य को प्राधान्यता देनी चाहिए । चार चीजों का यहाँ ज़िक्र किया है ।
सुभाषित में लिखा है हाथ की शोभा कंकण से नहीं दान से होती है । मतलब, धन की सफलता धन के संग्रह से या सिर्फ खाने पीने में नहीं है, दान करने में है । जगडू शाह, कर्ण, कुमारपाल राजा-वस्तुपाल-तेजपाल, जावड़-पेथडशाह मंत्रीश्वर आदि के नाम इतिहास के पन्नों में सुवर्णाक्षर से अंकित होने में दानधर्म ही कारण है । संग्रह करने वालों के नाम कभी इतिहास नहीं बनता । न तो उन लोंगों की तकती कहीं पर लगती हैं । इतना ही नहीं… अगर सुबह-सुबह ऐसे कंजुस का नाम ले लिया या मुँह देख लिया तो पूरा दिन भूखा रहना वगैरह परेशानी भुगतनी पड़ती है । दान देने वाले का हाथ हमेशा ऊपर रहता है । लेनेवाले का हाथ नीचे रहता है ।
जगत में आने के बाद अगर आपने धर्म नहीं किया, कीर्ति बनाने या बढ़ाने का काम नहीं किया तो आपका जन्म-जीवन व्यर्थ ही है । मानव हुए या जानवर कोई फर्क नहीं है । संग्रह करने वाला संपत्ति छोडकर नरक की ओर जाता है । सदुपयोग करने वाला पुण्य बाँधकर-पुण्य को साथ में लेकर (जो पुण्य संपत्ति के दान से बाँदा है) स्वर्ग में जाता है ।
वैसे ही धर्म करने वाला सद्गति और मुक्ति का अनुसंधान कर लेता है । धर्म करने वाली आत्मा अपना, अपने परिवार का और अपनी कई पीढ़ियाँ का नाम रोशन कर देते हुए अमर हो जाता है । पापी जीवों का कोई नाम भी नहीं लेता । धर्म की राह पर चलनेवाला इंसान को कभी मौत का भी डर नहीं होता । क्योंकि उनको दुर्गति छु भी नहीं सकती । सद्गति उनके स्वागत के लिए सदैव तैयार रहती है । पाप से बचाने की और धर्ममार्ग पर आगे बढ़ाने वाली बातें बताने का धर्मगुरुओं का दायित्व होता है । अंधकार में भटकतें आत्माओं को उजाला में ले जाना अपना कर्तव्य है ।
– आचार्य विजयभव्यदर्शन सूरीश्वर

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