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तेरापंथ जैन शासन का ही एक संप्रदाय है : आचार्य महाश्रमण जी

अहिंसा क्रांति / राजेन्द्र बोथरा


हैदराबाद।  आर्हत वांग्मय में कहा गया है आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा गुरु पूर्णिमा के रूप में प्रतिष्ठित है। हमारे जीवन में गुरु का भी बड़ा महत्वपूर्ण स्थान होता है, जिसको आदमी गुरु के रूप में स्वीकार करता है और शुद्ध गुरु होता है तो गुरु के प्रति श्रद्धा सम्मान का भाव भी होना चाहिए। आज के दिन मानो एक गुरु हमारे धर्म संघ में प्रतिष्ठित हुए यानी हमारे धर्म संघ के प्रथम आचार्य श्री भिक्षु स्वामी हुए ।आज का दिन तेरापंथ स्थापना दिवस के रूप में प्रतिष्ठित है।

तेरापंथ जैन शासन का ही एक संप्रदाय है, जैन शासन की दो परंपराएं है ,एक दिगंबर परंपरा व दूसरी श्वेतांबर परंपरा। दिगंबर -दिशा ही जिनका अंबर यानी निर्वस्त्र रहने वाले मुनि, श्वेतांबर यानी सफेद कपड़ा रखने वाले मुनि। श्वेतांबर परंपरा में आज के दिन एक संप्रदाय का प्रारंभ हुआ ,उस दिन हमारे धर्मसंघ का, हमारे पंथ का प्रारंभ हुआ। एक संगठन जिसका शुभारंभ होना महत्वपूर्ण बात है परंतु स्थापना की पृष्ठभूमि में क्या है, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है,अन्यथा कुछ शुरू हुआ और थोड़े से समय में वह अंत को प्राप्त हो सकता है।

मकान खड़ा है नींव में क्या है वह महत्वपूर्ण बात है। तेरापंथ एक प्रासाद आप मानलो खड़ा है तो उसकी नींव में क्या है?  मुझे ऐसा लगता है की तेरापंथ की नींव में त्याग जुड़ा हुआ है, त्याग कैसे? त्याग यानी छोड़ना, भीखण जी ने पहले कुछ छोड़ा था, एक संप्रदाय से अभिनिशक्रमण किया था, यह छोड़ना भी एक त्याग है, तेरापंथ का प्रारंभ छोड़ने के साथ भी जुड़ा हुआ है, छोड़ा तब नया कुछ शुरू हुआ। दूसरी बात है तेरापंथ की स्थापना त्यागमय है, स्थापना करने के लिए और क्या किया गया होगा, संत भीखण जी ने त्याग को स्वीकार किया, भीखण जी ने व अनेक संतों ने आज के दिन सर्व सावध योग का त्याग स्वीकार किया था,

इस त्याग की पृष्ठभूमि में कुछ श्रम लगा, चिंतन मनन लगा। राजनगर की बोधि प्राप्ति के बाद वह क्रम आगे बढ़ा और बगड़ी में  अभिनिशक्रमण की बात हो गई और वह धाराक्रम आगे बढ़ा तो केलवा मेवाड़ में दीक्षा स्वीकार की, उनके अनेक साथियों ने आज के दिन यह दीक्षा स्वीकार की है, यह तेरापंथ की स्थापना है। कुछ नया व विशेष करने के लिए आदमी को कष्टों को झेलना भी अपेक्षित होता है क्योंकि संघ बलिदान मांगता है। आचार्य भिक्षु जैन श्वेतांबर तेरापंथ के प्रथम आचार्य हुए हैं और उन्होंने जो आज के दिन संकल्प स्वीकार किया वह तेरापंथ कि मानो नींव में रखा हुआ है और वह पंथ आगे बढ़ा और एक महान पंथ जिसके लिए कहा गया “प्रभो यह तेरापंथ महान”। हमारा कर्तव्य यह होना चाहिए कि हम उस महानता को बनाए रखने में और ज्यादा पुष्ट करने में जितना योगदान दे सकें, देने का प्रयास करना चाहिए। तो प्रश्न है कि तेरापंथ की स्थापना का उद्देश्य क्या है? मुझे ऐसा लगता है कि इसका एकमात्र उद्देश्य, लक्ष्य आत्मा का कल्याण है।

केंद्रीय तत्व है वह है आत्मा का कल्याण, हमारी आत्मा का कल्याण हो, हम मोक्ष की दिशा में आगे बढ़े। तो तेरापंथ की नींव में त्याग है व आत्मा का कल्याण है। यह आत्मा के कल्याण की बात तेरापंथ में बनी रहनी चाहिए उसके लिए हमारे मन में आत्मनिष्ठा बनी रहनी चाहिए। हमारा धर्मसंघ है तेरापंथ, इस संघ के हम सदस्य हैं, इस संघ के प्रति हमारी सम्मान की भावना, निष्ठा की भावना रहनी चाहिए कि हमारे द्वारा संघ की जो सेवा हो सके उस में योगदान देना चाहिए ।

हमारी गुरु की आज्ञा के प्रति निष्ठा रहनी चाहिए ,आचार के प्रति निष्ठा रहे , श्रमण श्रेणी के प्रति निष्ठा रहे और फिर मर्यादा निष्ठा, मर्यादाओं के प्रति हमारे मन में सम्मान रहे। तेरापंथ का अपना इतिहास भी है दर्शन भी है मर्यादा भी है, तो हम अपने धर्मसंघ की गरिमा को आंच न आने देने का और अपनी अच्छी साधना करने का प्रयास करते रहे। तो यह आज का दिन जो तेरापंथ स्थापना दिवस के रूप में प्रतिष्ठित है, मैं परम पूज्य आचार्य भिक्षु व पूर्ववर्ती आचार्यों और तमाम हमारे धर्म संघ की चारित्र आत्माओं, जो अतीत में हुई है और आज भी है, सब के प्रति मंगल कामना श्रद्धाभाव अर्पण करता हूं और हमारे श्रावक- श्राविकाए, संस्थाए, श्रमण श्रेणी सदस्य, हम सब आत्म साधना में आगे बढ़े और तेरापंथ की सेवा करते रहे और तेरापंथ के द्वारा मानव जाति आदि की भी सेवा करते रहे यह काम्य है।

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