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राग-द्वेष और पक्ष-विपक्ष की सोच दिमाग में से निकाल दें : आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर म. सा

AHINSA KRANTI NEWS

मैसूर।  श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर तथा साध्वी भद्रिकाश्रीजी म. ने धर्म संदेश मे बताया कि – जैन शासन के ग्रंथों की बातें करें तो इतना जरूर नज़र आयेगा कि – प्रत्येक आगमों और शास्त्रों में आत्मा को केन्द्र में रखकर ही हर बातें की है । हाँ, आत्मा केन्द्र में रहने से ऐसा नहीं होता है कि – शरीर-परिवार-ज्ञाति-रिश्तें वगैरह की एकांत उपेक्षा की गई है । स्याद्वाद और अनेकांत दृष्टि को मुख्य बनाकर हरएक बात शास्त्रकार बताते है ।

अनेकांत दृष्टि में कभी भी कोई भी चीज का अपलाप नहीं किया जाता है । इस में तो एक दृष्टि को आगे करके बात की जाती है । बाकी की दृष्टि को अबाधित रखा जाता है ।प्रभु के संपर्क में आने पर गणधर भगवंतों की आत्मा को ऐसा ज्ञानावरणीय कर्म का विशिष्ट क्षयोपशम जग जाता है कि – स्याद्वाद और अनेकांत की नीव पर सारे आगमों की अल्पावधि में ही रचना संभवित हो जाती है । हरएक आत्मा में केवलज्ञान की सत्ता होने पर भी प्रभु के बिना संपर्क वह क्षयोपशम नहीं होता । यह रचना नहीं होती ।इस स्याद्वाद-अनेकांतवाद में जगत की हर समस्या का समाधान है । चाहे तो सारे झगड़े का अंत इस से ला सकते है ।

समाधान के कई पहलू इस में दिये गये है । सबसे पहली शर्त यह है कि – मध्यस्थ बने । राग-द्वेष और पक्ष-विपक्ष की सोच दिमाग में से निकाल दें । निष्पक्षता के साथ सत्य और सन्मार्ग की खोज करें ।प्रभु महावीरदेव ने अपने ग्यारह गणधर भगवंतों को हर उलझनों का समाधान वहीं वेदपदों के माध्यम से और स्याद्वाद शैली से ही दिये थे । केवलज्ञानी भी शंकाओं का समाधान देने के लिए शास्त्रों को ही आधार बनाते है, लेकिन एक बात यह भी है कि – शास्त्रों से ही तो शंकाए भी उठती है । उलझनों – प्रश्नो शास्त्र से उठने पर भी वही शास्त्रों को स्याद्वाद और अनेकांत के जरिए पढ़े और सोचें तो समाधान भी वहां पर ही मिल जाते है ।जिस दिन शास्त्र ही नष्ट हो जाते है, उस दिन समाधान देने के लिए माध्यम ही नहीं बचेगा ।

शास्त्रनष्ट होने पर शासन यानी तीर्थ का विनाश हो जाता है । इसका मतलब यह हुआ कि शास्त्ररचनाओं के साथ शासन का जन्म होता है, शास्त्र विनाश के साथ शासन का भी विनाश होता है । शासन-तीर्थ की उत्पत्ति और टिकाने का काम शास्त्र करता है । अलबत, शास्त्र को पढने-पढाने वाले निर्ग्रंथ होना भी बहुत जरूरी है । तब तो शास्त्र में ही लिखा गया – ‘न तित्थं नियंठेण विणा।’ निर्ग्रंथ-साधु के बिना तीर्थ-शासन संभवित ही नहीं है । पाप के बिना संसार नहीं चलता, साधुधर्म के बिना शासन नहीं चलता । धर्म सब को सिखाना पड़ता है, पाप किसी को सिखाना नहीं पड़ता । क्योंकि पाप की सोच-समझ अनादिकाल से है । धर्म की सोच-समझ नहीं है । इस संसार में धर्म का विच्छेद कईबार होता है, पाप का विच्छेद कभी न हुआ है, कभी न होगा । मोक्ष में जाना कई जगहों से बंद होता है, नरक में जाना, तिर्यंचगति में जाना कभी बंद नहीं होता ।

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