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चरित्र से बनता है व्यक्तित्व :आचार्य महाश्रमण

AHINSA KRANTI NEWS
हैदराबाद।  8 अगस्त 2020 भैक्षव शासन के ग्याहरवें पट्टधर,महा तपस्वी पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री महाश्रमण जी ने ठाणं प्रवचन श्रंखला के अन्तर्गत  व्याख्या करते हुए बताया कि ठाणं आगम में निर्जरा के बारह प्रकार बताए हैं उनमें पांचवां प्रकार है कायक्लेश। इसका सीधा संबंध शरीर से है, साधना करने से जो कष्ट होता है उससे  कायक्लेश निर्जरा होती है | तप भी एक कायक्लेश है |कभी गोचरी को गए आहार नहीं मिला,कभी रात्रि में प्यास लग गई तो पानी नहीं पीना , सर्दी गर्मी हर स्थिति में समता रखना महान तप है , निर्जरा है। इसके सात प्रकार होते हैं, इन्हें आसन भी कहा गया है।   १. कायोत्सर्ग में स्थिर हो जाना, यह बैठकर, खड़े होकर तथा लेटकर भी किया जा सकता है |
मूल बात है काया को ढीला छोड़कर उसका उत्स्रर्ग कर देना, शिथिल कर देना व उसका ममत्व छोड़ देना। यह सोचना कि शरीर मेरा नहीं है, काय ममत्व का विसर्जन कर देना। २. उत्कटूक आसन – दोनों पैरों को भूमि पर टिका कर दोनों पूटों को भूमि पर न छुआते हुए जमीन पर लेट जाना, इसका प्रभाव हमारी वीर्य ग्रन्थियों पर पड़ता है व ब्रह्मचर्य की साधना पुष्ट बनती है | ३. प्रतिमा स्थायी आसन, भिक्षु प्रतिमाओं की विभिन्न मुदाओं में स्थित रहना |  ४. वीरासन – इसमें बद्ध-पद्मासन की तरह पद्म की मुद्रा में आ जाना, इससे धेर्य, संतुलन व कष्ट सहिष्णुता का  विकास होता है ५. नैषधिक इसमें बैठकर किए जाने वाले विभिन्न आसन शामिल है जैसे गोदोहिका आसन की मुद्रा आदि, इसमें भगवान महावीर को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ ६. दंडायतिक – यह दंड की तरह सीधा लेटकर किया जाता है | इससे हमारा स्नायविक तनाव कम होता है | ७. लगंडसायी आसन – इससे कटि की स्नायुओं की शुद्धि व उदर-शुद्धि होती है |
  आचार्य प्रवर ने आगे बताया कि मन को साधने के लिए शरीर को साधना भी जरूरी होता है | कोई शरीर व कपड़ों की विभूषा से बड़ा नही बन सकता है और न दिख सकता है, व्यक्ति चरित्र से बड़ा होता है| ऐसे में हमारा ज्यादा ध्यान आत्मा व मन को विभूषित करने की ओर जाए | हमें यह ध्यान देना चाहिए कि जब तक हमें  बुढ़ापा न आये, व्याधियां न सताये व इन्द्रियां क्षीण न हो तब तक धर्म साधना कर लो | सारांश यह है कि शरीर की सक्षमता जब तक है तब तक जो अच्छा करना हो सो करलो और हमारा शरीर भी स्थिर रह सके और मन भी एकाग्र रह सके ऐसा अभ्यास हमें करना चाहिए, इससे हमारी आत्मा को भी लाभ मिलेगा।

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