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ध्यान व दर्शन दोनों एक साथ नहीं हो सकते : विराग सागर महाराज

अहिंसा क्रांति / सोनल जैन
भिंड।  परम पूज्य अध्यात्म योगी गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महाराज ने अपनी पीयूष देशना के माध्यम से कहा- ध्यान व दर्शन दोनों एक साथ नहीं हो सकते। ध्यान की अवस्था में आंखें खुली होने पर भी कुछ नहीं दिखता प्राय देखा भी जाता है कि कोई व्यक्ति विचारों में डूबा हो और सामने से कोई आता जाता है अथवा बोलता है तो भी उसे दिखाई सुनाई नहीं पड़ता अर्थात जिसका उपयोग जिस ओर रहता है वही बातें चिंतन मनन ध्यान में आती हैं
उपयोग सही ना हो तो भगवान के दर्शन पूजन स्वाध्याय जाप माला का जो फल मिलना चाहिए वह नहीं मिल सकता। पूज्य गुरुवर ने बताया अज्ञानता वश व्यक्ति शरीर को दर्शन मान लेता है यह उसकी सबसे बड़ी भूल है जैसे अंडा पंगु के कंधे पर बैठ कर यह मान लेता है कि मैंने सही रास्ता पार कर लिया उसी प्रकार भेद विज्ञान के अभाव में अज्ञानी जीव शरीर से संबंध रखने वाले हाथ पैर आंख मुख आदि को अपना मान लेता है भगवान कहते हैं यह तो मात्र संयोग की बात है किंतु वास्तविकता में यह शरीर तुम्हारा नहीं है वह यहां पर ही रह जाएगा कहने का तात्पर्य है देखने वाली तो आत्मा है शरीर नहीं क्योंकि आंखें तो मुर्दा की भी होती हैं लेकिन वह नहीं देख पाता शरीर तभी तक काम करता है जब तक आत्मा है आत्मा के निकलने पर शरीर किसी काम का नहीं रह जाता अपितु अपने घर परिवार कुटुंबी जन उसे श्मशान में ले जाकर अग्नि लगाकर जला देते हैं अतः हम अपने जीवन में इस शरीर आत्मा के भेद को जाने समझे और आत्मसात करते हुए अपने अमूल्य जीवन को सही दिशा में लगाते हुए उसे सार्थक और सफल बनाएं यही आपके मानव जीवन की सार्थकता है।

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