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साधु संतों का प्रवचन चिंतन मनन के साथ श्रवण करना लाभदायक : आचार्य महाश्रमण जी

अरोरा कॉलेज में आचार्य महाश्रमण जी का आज 06/07/2020 का प्रवचन


चार दुर्लभ चीजें बताई गई है उनमें पहली दुर्लभ चीज है मनुष्यता। मनुष्य जन्म दुर्लभ है और मनुष्य जन्म मिल भी जाए तो धर्म की बात को सुनने का मौका मिलना कठिन है। और श्रुति का अवसर भी मिल जाए तो सुनी हुई अच्छी बात पर श्रद्धा का होना भी कठिन है, और श्रद्धा भी हो जाए तो संयम में वीर्य, पुरुषार्थ ,पराक्रम करना मुश्किल होता है। संसार मे चौरासी लाख जीव योनिया बताई गई है उनमें यह मनुष्य की योनि, मनुष्य का जन्म दुर्लभ है और इस मानव जन्म को पाकर धर्म के बारे में जानने का मौका मिलना ओर भी मुश्किल होता है। वो मानो कोई भाग्यशाली है कि जिनको ऐसा मौका मिलता है। और धर्म की बात भी त्यागी साधु के मुख से सुनने का मौका मिले तो और भी विशेष बात हो सकती है ।


ज्ञान ऐसे पुस्तक पढ़कर भी किया जा सकता है। पुस्तक ज्ञानार्जन का अच्छा साधन है पर एक त्यागी साधु प्रवचन कर रहा है और उसको कोई सुन रहा है तो ज्ञान की बात कानों में आ ही रही है साथ में साधु की उपासना भी हो रही है। इसलिए भी श्रवण का कुछ अधिक महत्व हो सकता है। प्रवचन एक संत का होना, गुरु का होना, त्यागी व्यक्ति का होना क्योंकि वह केवल बोलते ही नहीं है, बोलने को तो और भी कोई बोल दे एक तोता भी कुछ बोल दे, बोलने के साथ उनकी साधना व त्याग जुड़ा हुआ है। एक बात सामान्य आदमी कह रहा है और वही बात एक त्यागी संत के मुख से आ रही है तो उसका एक त्याग के साथ जुड़ी हुई बात होने से अधिक महत्व हो सकता है ,अपने श्रद्धेय के मुख्य से आ रही है तो वह भी एक महत्व की बात हो जाती है। इसलिए साधु का वचन सुनना अच्छी बात है।

हमारे यहां मंगल पाठ उच्चारण की प्रसिद्ध परंपरा है, कितने लोग कहीं जा रहे हैं या कोई समस्या है कोई विशेष प्रसंग है जीवन का तो साधुओं के मुख से, गुरुओं के मुख से मंगल पाठ सुनने का प्रयास करते हैं। प्रवचन श्रवण हो और फिर उसका कुछ चिंतन मनन हो जाए तो और ज्यादा वह श्रवण लाभदायक सिद्ध हो सकता है। सुनना भी एक कला है, सुने ज्यादा बोले कम। सुनने वाले अनेक प्रकार के हो सकते हैं उनमें एक हैं श्रोता- ज्ञान की बात सुनने वाला, दूसरा सोता – नींद में सुनने वाला और तीसरा सरोता – बात को काटने वाला। श्रोता का दूसरा अर्थ है श्रावक, आप लोग गृहस्थ है साधु तो नहीं है पर श्रावक तो हो सकते हैं जो सुनता है वह श्रावक है, ज्ञान की बात सुनने वाला हमारी परिभाषा में श्रावक हो सकता है। साधु भी एक अपेक्षा से श्रावक हो सकता है क्योंकि वह भी गुरु की बात सुनने वाले हैं।हमारे श्रोता प्रवचन की बात को सुनकर के जितना हो सके भीतर ले जाने का प्रयास करें, आचरण तो मान लो पुरा न भी हो परंतु अच्छी बातों को सुनना भी अच्छा होता है। पहले श्रवण तो करो पहली पेड़ी पर तो जाओ, अगली पेड़ी मान लो बाद में है एक पेड़ी तक तो पहुंचो। पहली पेड़ी है सुनना ,मतलब आप पहली पेड़ी पर आ गए। प्रवचन सुनने का अच्छा तरीका रहे व अच्छे ढंग से ग्रहण करने का प्रयास रहे यह काम्य है।

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