जैन समाचार

जिसने घर में जिना सीख लिया उसका मंदिर जाना सार्थक हो जाता है- गच्छाधिपति जिनमणिप्रभसूरि

AHINSA KRANTI NEWS/ RAJENDRA JAIN


मांडवला\ मांडवला स्थित विश्व प्रसिद्ध स्थापत्य जहाज मंदिर के परिसर में चातुर्मास हेतु विराजमान गच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभसूरि ने भारती के देवता माता पिता’ विषय पर प्रवचन देते हुए कहा- आज परिवार टूट रहे हैं! साथ जीने पर भी हम साथ नहीं जी पा रहे हैं। जहाँ हर व्यक्ति केवल अपनी इच्छाओं को ही महत्व देगा, वहीं टकराव अनिवार्य है।उन्होंने शासकीय आदेशों का पालन करते हुए प्रवचन प्रदान किया, जिसका ऑनलाईन प्रसारण किया गया। उन्होंने कहा- जिसने घर में जीना सीख लिया, उसका मंदिर जाना सार्थक हो जाता है। घर के तनाव को लेकर जो व्यक्ति परमात्मा के मंदिर में जायेगा, उसे मंदिर में परमात्मा के दर्शन कहाँ से हो पायेंगे। उन्होंने कहा- जिस घर में बड़े बूढे माता पिता दर्द का अनुभव करते हों वह घर संपन्न होने पर भी नरक जैसा है।

माता पिता इस दुनिया के प्रत्यक्ष भगवान है। पहले इनकी सेवा होगी तभी परमात्मा हम पर अनुग्रह करेंगे।उन्होंने अपने बचपन की घटनाएं सुनाते हुए कहा- जरा अपने बचपन को याद करना, याद नहीं आये तो घर के आंगन में खेलते किसी बच्चे को देखकर अपने साथ तुलना कर लेना कि माता पिता ने कितनी परेशानियों उठाकर तुम्हें पाल पोस कर बड़ा किया था। जब तुम्हें उनकी जरूरत थी, उंगली थामे रखी और जब वृद्धावस्था आने पर उन्हें तुम्हारी जरूरत पड़ी तो छोड कर चल दिये! यह कैसी मानवता है, यह कैसा जैनत्व है।उन्होंने कहा- बचपन में अपने माता पिता की अंगुली पकड कर चलना तभी सार्थक होगा जब उनके बूढे हो जाने पर तुम उनके हाथ की लाठी बनोगे। उन्होंने कहा- ये लोग भाग्यशाली है जो सुबह ही सुबह उठकर अपने माता पिता के चरणों में सिर झुका कर बंदना करते हैं, और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर अपने जीवन को सफल बनाते हैं। ये लोग दुर्भाग्यशाली है, जिनके घरों में माता पिता होते हुए भी उनके आशीर्वाद को प्राप्त करने का भाव हृदय में नहीं उठता।उन्होंने परमात्मा महावीर के जीवन की एक घटना का वर्णन करते हुए कहा- जब देवानंदा परमात्मा महावीर के समवशरण के पास से निकल रही थी, तो अचानक उसके मन में महावीर को निहारने का एक आकर्षण पैदा हुआ।

वह महावीर को जानती नहीं थी, न धर्म को जानती थी! बस एक आकर्षण उसे खींचे ले जा रहा था। वह दौडली गई… सीठियाँ चढती गई। और परमात्मा महावीर के सामने खड़ी होकर एकटक उन्हें निहारने लगी।उसकी आँखों से जैसे अमृत छलकने लगा। गौतम स्वामी अचरज से भर उठे। उनकी जिज्ञासा ने प्रश्न करने पर मजबूर कर दिया। परमात्मा से पूछा- भगवन्! आपकी आँखों से अमृत पान करने तो दुनिया आती है। यह बहिन कौन है, जो आप पर अमृत बरसा रही है। और न केवल अमृत बरस रहा है। बल्कि अचानक इसके स्तनों से दूध की धारा बहने लगी है। मुझे समाधान दीजिये।परमात्मा महावीर ने कहा- गौतम! यह मेरी मां है। मैं इसके गर्म में 83 दिन रहा हूँ। मेरे निर्माण में इसका योगदान है। मां का वात्सत्य ही दूम बनकर बरस रहा है। आचार्यश्री ने कहा- घर में तनाव हो ही नहीं सकता. पदि पारस्परिक व्यवहार विवेक पूर्ण हो ।

यदि परिवार की शाति बाहिये तो आज से ही संकल्प कर लीजिये कि घर में माता पिता, दादा दादी जो भी बढे बुजुर्ग है, उन्हें सुबह उठकर नमस्कार करेंगे। एक नमस्कार सारे विवादों, तनावों को नष्ट कर डालता है।इस अवसर पर आचार्य जिनमनोज्ञसूरि ने प्रवचन देते हुए कहा- हम भारतीय संस्कृति से दिनोदिन दूर होते जा रहे हैं तथा पाश्चात्य संस्कृति का लगातार हमारे घर में प्रवेश हो रहा है। और यही परिवार के दूटने का कारण है। उन्होंने कहा- भारतीय संस्कृति में परिवार की पूर्णता है। ग्रहों परिवार के हर संबंध के लिये अलग सबोधन है। पिताजी के बड़े भाई को ताउजी तो छोटे भाई को बाचाजी कहा जाता है। मा के भाई को मामा तो पिता की बहिन को भूआ कहा जाता है। जबकि अंग्रेजी कल्पर में हर संबंध के लिये एक ही अंकल शब्द है। वहां परिवार की पूर्णता नहीं है।

Mukesh Nahar

Editor-in-Chief | ahinsakranti@gmail.com | 9021899800 Jodhpur, Rajasthan

Related Articles

Back to top button
error: Content is protected !!
%d bloggers like this: