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मनुष्य जीव को पैसे से ज्यादा जरूरत पुण्य की है : आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर म. सा

AHINSA KRANTI NEWS

मैसूर। 15 सितम्बर 2020 श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर तथा साध्वी भद्रिकाश्रीजी म. ने धर्म संदेश मे बताया कि – हकीकत में सोचा जाय तो जीव को पैसे से ज्यादा जरूरत पुण्य की है । पैसे चौबीस घंटे नहीं लगते है किंतु पुण्य की गरऩ हरएक समय पे, हरएक जगह पे, हरएक कदम पे, हरएक साँस पे होती है । कई सारे कार्य बिना पैसे हो जाते है लेकिन बिना पुण्य एक भी कार्य संपन्न नहीं होता । हाँ, ऐसा बहुतबार होता है कि – एक पैसे का खर्च किये बिना कई सारें कार्य निष्पन्न हो जाते है, वह पुण्य का ही प्रभाव है । पैसे से ज्यादा लंबा-चौड़ा क्षेत्र पुण्य का है । पैसे की चोरी चपाट़ी होती है । पुण्य को कोई चुरा नहीं सकता । पैसे वालें को बेचैनी-चिंता रहती है, पुण्यवाले को शांति एवं समाधि मिलती है । पैसे से ज्यादा पुण्य कमाने का पुरूषार्थ करने जैसा है । इसी ही कारण पुण्यकमाने के तरीके यहाँ दिखा रहे है ।


6. मनपुण्य – मन में अच्छे विचार, अच्छी सोच रखने से यह पुण्यबंध होता है । दूसरे के प्रति खराब सोच से भी पापोपार्जन होता है । इसलिए हमेशा दूसरे के प्रति, दुश्मन के प्रति भी अपने दिल में अच्छी भावना होनी चाहिए । दुश्मन को भी हम दुश्मन न समझें । वो दुश्मन बनने में हमारा कर्म ही जिम्मेदार है । अपन तो सब जीवों को मित्र ही मानना है । सब जीवों के हित की कामना करना है । ऐसी भावना से भी आप बिना पैसे, बिना परिश्रम मनपुण्य अर्जित कर सकते हो । प्रभु स्मरण से भी मन पुण्य बांध सकते हो ।


7. वचनपुण्य – मीठे़ – हितकर – सत्य – पथ्य वचनों के प्रयोग से यह पुण्य उपार्जित होता है । कड़वे – असत्य – असभ्य – गाली – गलोज़ – कलहकारी वचनों के प्रयोग से पापबंध होता है । लाखों रूपयों का खर्च करने के बावजूद जो संबंध नहीं बनते वो संबंध सिर्फ वचनों की मीठास से बनता है । वह रिश्ता लंबे समयावधि तक टिकता भी है । पैसे के संबंध में खटास जल्द आ जाती है । प्रभु के गुण-गान से भी यह पुण्य प्राप्त होता है ।


8. कायपुण्य –  शरीर का इस्तेमाल कैसे करने से पुण्य मिलता है ? जवाब में ज्ञानी भगवंत फरमातें है – मन और वचन के भांति काया का भी उपयोग स्व-पर के हित के लिए करें । काया से भगवान की भक्ति करें, तीर्थों की यात्रा करें । तप-जप-ध्यान-साधना करें … उससे भी आप कायपुण्य का उपार्जन करने का लाभ उठा़ सकते हो । चतुर्विध संघ की सेवा वैयावच्च करने से बड़े पैमाने पे यह पुण्य होता है । कायपुण्य से कम कष्ट वचन पुण्य मे है । वचन पुण्य से भी कम कष्ट मनपुण्य उपार्जन मे होता है।

9. नमस्कार पुण्य – सबसे उत्कृष्ट पुण्य बांधने का ये तरीका है । नमस्कार करने योग्य, गुणवान आत्माओं को नमस्कार करने से यह पुण्य बंधता है । इन्सान अपने स्वार्थ के जरिए कई अफसरों को सलाम लगाता है । सेल्युट करता है, उससे यह पुण्य नहीं मिलता । नमस्कार करने योग्य नमस्कार न करने के कारण ही न झूकने लायक आदमीयों को झूकना पड़ता है । सामायिक-प्रतिक्रमण-पौषध-संयमजीवन जीने से भी यह विशिष्ट पुण्य की आमदनी होती है ।

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