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परिस्थितियों को सुख का कारण मत मानो : मुनि मनितप्रभ सागर

AHINSA KRANTI NEWS

मांडवला । मांडवला। मे स्थित विश्व में सुविख्यात स्थापत्य जहाज मंदिर के पावन परिसर में आचार्य जिनकांतिसागरसूरि महाराज के शिष्य गच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभसूरीश्वर महाराज एवं आचार्य जिनमनोज्ञसूरीश्वर महाराज सहित 8 मुनियों व 29 साध्वीजी का चातुर्मास प्रारंभ है।चातुर्मास में आराधना के प्रतिदिन के क्रम में गुरुवार को प्रवचन देते हुए मुनि मनितप्रभसागर ने साधु-साध्वीजी की धर्मसभा में संबोधित करते हुए कहा कि जीवन को हमने दुःखमय बना दिया है। दुःखमय है नहीं, पर सुख की अजीब व्याख्याओं के कारण वैसा हो गया है। हम अपनी ही व्याख्याओं के जाल में फॅंस गये हैं। जिस जाल में फॅंसे हैं, उस जाल को हमने ही अपने विचारों और व्याख्याओं से बुना है। 

   मुनि मनितप्रभसागर कहा- सुखी होने का मंत्र एक ही है- सुख का आधार बाहर मत बनाओ। बाहर के द्रव्यों, परिस्थितियों को सुख का कारण मत मानो। जीवन परम आनन्दमय हो जायेगा।धर्म सभा में मुनि मेहुलप्रभसागर ने कहा कि भले हमें विभिन्न मोडों से गुजरना पडे पर सर्चलाइट तो एक ही पर्याप्त होती है। ऐसा तो होता नहीं कि दांये जाने के लिये टॉर्च अलग चाहिये और बांये जाना हो तो टॉर्च अलग किस्म की चाहिये।

क्योंकि अन्तर मात्र दिशा का है। न मुझमें अन्तर हुआ है, न राह पर रोशनी डालने वाले में!उन्होंने कहा- जीवन एक निर्णय से नहीं चलता। विभिन्न परिस्थितियों में परस्पर विरोधी निर्णय भी लेने होते हैं। कभी प्यार से पुचकारना होता है तो कभी लाल ऑंखें करते हुए डांटना भी होता है। कभी लेने में आनंद होता है तो कभी देने में भी आनंद का अनुभव होता है। दिखने में भले निर्णय अलग अलग प्रतीत होते हों, पर अन्तर में उनका यथार्थ/ निहितार्थ/ फलितार्थ एक ही होता है। पुचकारना भी उसी लिये था जिसके लिये डांटना था।कोरोना के कारण लगे हुए अनलॉक के कारण धर्मसभा में सोशियल डिस्टेसिंग का पालन किया गया। संपूर्ण विश्व के लिए शांति की प्रार्थना की गई।

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