जैन प्रवचन jain pravchanजैन समाचार

अभय अपने आप में एक अच्छा गुण,अच्छी अर्हता अच्छी योग्यता है : आचार्य महाश्रमण जी

अहिंसा क्रांति / राजेन्द्र बोथरा
हैदराबाद।  ठाणं आगम में बताया गया है आदमी को भय भी लगता है और प्राणी भी भयभीत होते हैं शास्त्रकार ने बताया है कि भय के सात स्थान है। सात कारणों से प्राणी डर जाता है। पहला भय है सजातीय से होने वाला भय जैसे आदमी आदमी से डरता है। दूसरा है विजातीय से होने वाला भय जैसे आदमी है वह तिर्यच आदि से डर जाता है। तीसरा है आदान भय यानी चोरी का भय ,कोई मेरा सामान उठा न ले जाए।चौथा भय बताया है अकस्मात भय ,कोई बाह्य निमित्त के बिना होने वाला भय। पांचवा प्रकार  बताया है वेदना भय, शरीर आदि में पीड़ा से होने वाला भय, वेदना, पीड़ा, कष्ट से डरना वेदना भय है । छठा भय बताया है मरण भय, मृत्यु का भय, आदमी के लिए कितना बड़ा भय है- मौत मौत मौत। धन्य है उन महापुरुषों को जो मौत से डरते नहीं। हम मौत से ना डरे ऐसा अगर अभय का भाव, मनोबल अगर जाग जाए तो कितना हमारा अभय पुष्ट हो सकता है। सातवां भय है अकिर्ती का भय।
डर, भय लगे तो  भिक्षु स्वामी का आलंबन लिया जा सकता है। परम बात यह होगी कि स्वयं निर्भीक बन जाए, भिक्षु स्वामी का आलंबन न लेना पड़े। तो हमारे में इतनी निर्भीकता पैदा हो जाए कि सात जो कारण बताए है वे कारण तो है,वे कारण रहे नहीं, इतनी साधना हमारी आगे बढ़े। न इह लोक भय, न परलोक भय , न आदान भय, न अकस्मात भय और न वेदन भय , न मरण भय, न अश्लोक भय, कोई भय नहीं रहे। ऐसी अभय की साधना का सलक्ष्य प्रयास किया जाए। नमो जिणाणं जियभयाण ऐसा जप किया जाए,अभय की अनुप्रेक्षा की जाए और महत्वपूर्ण बात है दूसरों को अपनी ओर से भयभीत नहीं करना चाहिए।
हम अभय रहना चाहते हैं तो हम दूसरों को अपने से जो छोटे हैं कमजोर है उनको अनावश्यक भयभीत करने का प्रयास न करें। खुद को अभय बनाने का एक यह महत्वपूर्ण सूत्र हो सकता है कि तुम दूसरों को भयभीत मत करो, तुम दूसरों को भयभीत नहीं करोगे तो तुम अभय की दिशा में भी आगे बढ़ सकोगे और मैत्री भाव, सब प्राणियों के प्रति मैत्री रखो, मैत्री भाव का विकास होने से भी हमारे भीतर में अभय का भाव विकसित हो सकता है जो अभय होता है वह परम सुखी हो सकता है। नमस्कार महामंत्र का भय के समय में जप करें,भय के बिना भी जप करें, यह एक उपाय है जिससे हम भय से अभय की ओर आगे बढ़ सकते हैं तो अभय अपने आप में एक अच्छा गुण है, अच्छी अर्हता है, अच्छी योग्यता है। तो आदमी को अभय होने की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए और जहां लक्ष्य बन जाए और साधना चलें, पुरुषार्थ हो तो कुछ प्राप्ति भी हो सकती है। हमारे हाथ में पुरुषार्थ करना है आदमी को अच्छे लक्ष्य के लिए अच्छा पुरुषार्थ करने का प्रयास करना चाहिए। तो यह सात जो कारण हमें ठाणं के सातवें स्थान में उपलब्ध हो रहे हैं वे कारण है हमारी साधना ऐसी बने वे कारण है हमारे लिए कमजोर पड़ जाए, हम अभय की दिशा में आगे बढ़ जाए।

Related Articles

Back to top button
Close